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‘हिंदी भाषी राष्ट्र में हिंदी दिवस जैसे शब्दों का प्रयोग गलत’

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हिंदी को बढ़ावा देने वाले सेवानिवृत्त प्रोफेसर डा.महेश दिवाकर। - फोटो : BIJNOR
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‘हिंदी भाषी राष्ट्र में हिंदी दिवस जैसे शब्दों का प्रयोग गलत’
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चांदपुर। गुलाब सिंह हिंदू स्नातकोत्तर महाविद्यालय चांदपुर से सेवानिवृत्त हिंदी प्रोफेसर डॉ. महेश दिवाकर विदेशों तक में हिंदी को प्रोत्साहित कर रहे हैं। डॉ. दिवाकर ने चांदपुर में 1988 में नवजात साहित्य कलामंच के नाम से संस्था स्थापित कर हिंदी को प्रोत्साहन देने का काम शुरू किया। संस्था के माध्यम से अनेक कवियों, लेखकों की रचनाओं को संग्रहित कर पुस्तक प्रकाशित कराई। डॉ. दिवाकर हिंदी दिवस या हिंदी पखवाड़े जैसे शब्दों को औचित्यहीन मानते हैं। उनका कहना है कि हिंदी भाषी राष्ट्र में हम ऐसे शब्दों का प्रयोग करके भाषा का अपमान कर रहे हैं।
हिंदी साहित्यकार डॉ. महेश दिवाकर का जन्म एक जनवरी 1950 को मुरादाबाद के गांव महलकपुर में ठाकुर कृपाल सिंह पंवार के यहां हुआ। उनकी नियुक्ति वर्ष 1983 में गुलाब सिंह हिंदू स्नातकोत्तर महाविद्यालय चांदपुर में हिंदी प्रवक्ता के पद पर हुई। 1988 में उन्होंने होली के दिन कुछ साहित्यकारों के साथ मिलकर चांदपुर में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए नवजात साहित्यकार मंच की स्थापना की थी। इसके तहत काम होता रहा और मंच का विस्तार होता रहा। फिर जरूरत के हिसाब से 1996 में इसका नाम साहित्य कला मंच कर दिया गया। 2006 में अखिल भारतीय साहित्य कला मंच कर दिया गया। विदेश तक हिंदी को पहुंचाने का काम हुआ। 2012 में संस्था को अंतरराष्ट्रीय हिंदी साहित्य कला मंच का नाम दिया गया।
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हिंदी में पीएचडी, डीलिट की उपाधि प्राप्त डॉ. दिवाकर की 150 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी सबसे पहली पुस्तक यादों के आरपार चांदपुर में 1988 में प्रकाशित हुई थी। डॉ. दिवाकर अब तक करीब 40 से ज्यादा युवाओं को हिंदी में पीएचडी करा चुके हैं। डॉ. दिवाकर हिंदी दिवस या हिंदी पखवाड़े जैसे शब्दों को औचित्यहीन मानते हैं। उनका कहना है कि हिंदी भाषी राष्ट्र में हम ऐसे शब्दों का प्रयोग करके भाषा का अपमान कर रहे हैं। अंग्रेजी दिवस की बात करें तो उचित है। साहित्यकार डॉ. महेश दिवाकर ने हिंदी को प्रोत्साहन देने के लिए गुलाब सिंह हिंदू स्नातकोत्तर महाविद्यालय से निवृत्त होने के बाद भी हिंदी को प्रोत्साहन देने का कार्य कर रहे हैं।
डॉ. दिवाकर को मिले सम्मान
हिंदी क्षेत्र में काम करते हुए डॉ. महेश दिवाकर को 2008 में नार्वे में विशिष्ट साहित्य सम्मान, 2011 में वैस्टइंडीज में ट्रिनिडाड हिंदी शिखर सम्मान, 2012 में मॉरिशस मेें विश्व हिंदी सेवी सम्मान, 2013 को नेपाल में विश्व हिंदी सेवी सम्मान व श्रीलंका में निराला सृजन सम्मान, 2014 में सिंगापुर में साहित्य श्री सम्मान व दुबई में विश्व हिंदी सेवी सम्मान, 2016 में फ्रांस में विश्व हिंदी सेवी सम्मान, 2017 में आस्ट्रेलिया में महाकवि मैथिलीशरण गुप्त स्मृति हिंदी सेवी सम्मान से सम्मानित किया गया है।
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प्रकाशित पुस्तकें
यादों के आरपार, प्रणयगंधा, प्रेरणा के दीप, अतीत की परछाई, नेह केसरसिज, काव्यधारा, नई शती के नाम, हे मातृभमि भारत, आखर आखरगंध, क्या कहकर पुकारूं, बाल सुमनों के नाम, आजू राजू आदि।
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