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ये कैसा बुखार, स्वास्थ्य विभाग की लाचार

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ये कैसा बुखार, स्वास्थ्य विभाग की लाचार
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बिजनौर। जिले में बुखार भयानक रूप लेता जा रहा है। बुखार से प्रतिदिन छह मौत हो रही हैं। पिछले एक सप्ताह में इस बुखार से 25 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। घर-घर में बुखार से पीड़ित लोग हैं और स्वास्थ्य विभाग लाचार बना हुआ है। अस्पतालों में जगह न होने के कारण लोग कोरोना की जांच नहीं करा रहे हैं। घर पर रहकर ही चिकित्सकों से बातचीत कर अपना इलाज करने में लगे हैं। अदृश्य शत्रु बनकर उभरे कोरोना संक्रमण के साथ ही अब बुखार भी लोगों पर जानलेवा हमला करने लगा है। इसे लेेकर हर कोई परेशान है और भय का माहौल व्याप्त है।
बुखार से कांपते मरीजों से जिला अस्पताल से लेकर निजी अस्पताल और क्लीनिक भरे पड़े हैं। चिकित्सक किसी नए वायरस की आशंका जता रहे हैं, जिसका स्ट्रेन डेंगू एवं चिकनगुनिया से मिलता जुलता है। इस बार के बुखार के वायरस का नेचर खामोश है। इस बुखार पर पैरासिटामॉल भी बेअसर साबित हो रही है। जिससे कई मरीज किडनी गंवाने के कगार पर पहुंच गए हैं।
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जिला अस्पताल के एमडी मेडिसिन डॉ. राधेश्याम वर्मा शरीर में वायरस के प्रवेश के दो से चार दिनों में लक्षण प्रकट होता है। तेज बुखार 103 डिग्री तक हो सकता है, किंतु यह दो दिन से ज्यादा नहीं टिकता। उन्होंने बताया कि इस बुखार में ऐसे जोड़ों में दर्द पहले होता है, जहां चोट लग चुकी है, या विकारयुक्त है। पैरों के जोड़ों से शुरू होने वाला दर्द टखने, एल्बो, कंधे तक पहुंच रहा है। आमतौर में डेंगू में बदन दर्द तेज होता है, किंतु जोड़ों में इतना नहीं होता।
जिला अस्पताल के ही चेस्ट फिजीशियन डॉ. हरिमोहन गुुप्ता के अनुुसार पांच से सात दिनों में चिकनगुनिया का बुखार उतर जाता है, किंतु जोड़ों के दर्द समेत अन्य लक्षण 15 दिनों से महीने भर तक टिक सकते हैं। इस बुखार में जहां प्लेटलेट्स गिरती हैं, वहीं चिकनगुनिया में ऐसा नहीं होता। इसमें शरीर पर लाल चकत्ते एवं खुजली होती है।
पंडित चंद्रकांत आत्रेय मेमोरियल हॉस्पिटल के स्वामी डॉ. अवधेश वशिष्ठ का कहना है कि वर्तमान में शुगर, हृदयरोगी एवं अधिक उम्र के लोग हाईरिस्क जोन में हैं। दो दिनों तक तेज दर्द रहने के दौरान कई बार वृद्ध मरीज एवं रोगियों में मल्टी आर्गन फेल्योर में चला जाता है। बच्चों पर भी यह वायरस ज्यादा असर कर रहा है। हालांकि एक बार यह कमर तोड़ बुखार होने के बाद इसकी एंटीबॉडी शरीर में सदा के लिए बन जाती है और भविष्य में यह रोग नहीं होता।
विश्नोई नर्सिंग होम के संचालक डॉ. राहुल विश्नोई की मानें तो इस वायरस के प्रति शरीर में एंटीबॉडी बन चुकी होती है, किंतु अगर ऐसे व्यक्ति को टाइप-1 या इस परिवार का कोई नया वायरस लग गया हो तो मरीज की मौत तक होने की संभावना बनी रहती है। आंशिक प्रतिरोधक क्षमता वाला शरीर इस वायरस से लड़कर खुद ही पस्त हो जाता है। उन्होंने बताया कि इस बुखार के वायरस में भी जोड़ों में दर्द, 102 डिग्री बुखार, थकान, चक्कर आना, भूख में कमी जैस लक्षण प्रकट करते हैं, ऐसे में वायरस का नेचर पता नहीं चल पाता है।
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दवाओं से किडनी हो रही घायल
गांवों में बुखार के प्रकोप को देखते हुए झोलाछापों की भूमिका बेहद भयावह मिली। लगभग 70 फीसदी मरीजों में पहले ही दिन पैरासिटामाल के साथ आइब्रूफेन, जेंटामाइसीन, एमीनोग्लाइकोसाइड, वोवरान, एस्परीन, निप्रोसीन, निम्यूस्लाइड जैसे पेनकिलर लेते हैं, जिसका किडनी पर घातक असर होता है। अधिकांश बुखार में चिकित्सकों ने सिर्फ पैरासिटामॉल के लिए कहा है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से गांवों में मॉनिटरिंग कराई जा रही है। यह वायरल बुखार का मौसम है। मलेरिया बुखार को लेकर भी परेशान होने की जरूरत नहीं। जिला अस्पताल और जिले के अन्य प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को अलर्ट मोड पर कर दिया गया है।
ऐसे करें बचाव
- मच्छरदानी, ओडोमॉस लगाएं, पूरी बाजू के कपड़े पहनें।
- जलभराव, गंदगी, एवं मच्छरों वाली बस्तियों से दूरी बरतें।
- तेज बुखार होने पर माथे पर ठंडी पानी में भीगी पट्टी रखें।
- बुखार आने पर अधिक गरम स्थान न लेटें।
- उबला हुआ पानी मिट्टी के बर्तन में रखकर पीएं।
- रेडीमेड खाद्य और पेय पदार्थों से परहेज करें।
- स्वयं ही अपने उपचार में न लगें, चिकित्सक की सलाह लें।
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