उम्मीद की मशाल : बेटियों को संस्कृति से जोड़ने को भीष्म प्रतिज्ञा निभा रहीं डॉ. प्रियंवदा
अचल चौधरी
बिजनौर। आज के दौर में लोग उच्च शिक्षा लेने के बाद बेहतर नौकरी का सपना देखने लग जाते हैं, लेकिन डॉ. प्रियंवदा वेदभारती ने बेटियों को भारतीय संस्कृति और संस्कृत की संवाहक बनने के लिए ब्रह्मचारिणी रहने का संकल्प लिया। नौकरी को अलविदा कहकर गुरुकुल की नींव रखी। शिक्षा के साथ बेटियों को आत्मरक्षा के गुर भी सिखा रही हैं। गुरुकुल में शिक्षा लेने वाली बेटियां देश और विदेश में संस्कृत की अलख जगा रही हैं।
डॉ. प्रियंवदा वेदभारती ने बनारस में 25 सालों तक अध्ययन और अध्यापन किया। काशी से लौटी तो नजीबाबाद में बेटियों के लिए गुरुकुल की स्थापना का सपना देखा। 1996 में खुद की जमापूंजी और समाज के सहयोग से नजीबाबाद में कोतवाली मार्ग पर गुरुकुल आर्ष कन्या विद्यापीठ की नींव रखी थी। इससे पहले इस गुरुकुल की क्षमता 85 छात्राओं की है। जोकि गुरुकुल में ही रहती हैं। शिक्षा निशुल्क है, केवल आवास का मामूली खर्च लिया जाता है। फिलहाल गुरुकुल में नेपाल, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, बिहार, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल आदि जगहों की रहने वाली छात्राएं शिक्षा ग्रहण कर रही हैं।
16 संस्कार और कर्मकांड में बनाया जा रहा निपुण
गुरुकुल में आधुनिकता का ख्याल रखते हुए अंग्रेजी, विज्ञान और गणित की शिक्षा भी दी जाती है। खासकर वेद वेदांग, ज्योतिष, व्याकरण, शिल्प, संगीत, वाद्य संगीत, दर्शनशास्त्र आदि पढ़ाया जाता है। यहां की छात्राएं 16 संस्कार और कर्मकांड में भी निपुण होती हैं।
छात्राएं भी बनी संवाहक
इसी गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा लेकर प्रभा भारती ने पश्चिम बंगाल और प्रगति भारती ने ने गुरुकुल खोले हैं। कई अन्य छात्राएं आचार्या और शास्त्री की डिग्री लेकर उपदेशिकाएं बन चुकी हैं। कुछ छात्राएं संस्कृत विश्वविद्यालयों में बतौर सहायक प्रोफेसर बन चुकी हैं। 15 छात्राओं ने जेआरएफ, बीस ने नेट पास किया है। जबकि दस छात्राएं पीएचडी की उपाधि ले चुकी हैं।
शुरुआती दिक्कतों से नहीं हारीं
डॉ. प्रियंवदा वेदभारती कहती हैं कि शुरुआत में भवन बनकर तैयार हो गए थे लेकिन, छात्राओं के छात्रावास के लिए भी खर्च नहीं निकल पाता था। तमाम दिक्कतें आई लेकिन सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने अपना जीवन बेटियों को संस्कृत की शिक्षा देने में न्यौछावर कर दिया।
आचार्य प्रियंवदा के मार्गदर्शन से मिली सफलता : आयुषी राणा
मेरठ की रहने वाली आयुषी राणा ने नजीबाबाद के आर्ष कन्या गुरुकुल से शास्त्री की डिग्री ली। फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी से संस्कृत में एमए और एमफिल किया। वह अब मेरठ के किसान इंटर कॉलेज में संस्कृत की प्रवक्ता हैं। फिलहाल लोक सेवा आयोग के माध्यम से आयुषी का चयन राजकीय इंटर कॉलेज के लिए भी हो चुका है, जिसमें पूरे प्रदेश में फर्स्ट रैंक आई है। आयुषी बताती हैं, संस्कृत से जुड़ने के लिए उन्होंने नजीबाबाद जाकर शिक्षा ली। आचार्य प्रियवंदा वेदभारती के द्वारा दी गई शिक्षा के चलते ही आज सफल हैं और भारतीय संस्कृति की खातिर संस्कृत की अलख जगा रही हैं।