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डाकू जो अंग्रेजों के सिर का दर्द और गरीबों का था मसीहा

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डाकू जो अंग्रेजों के सिर का दर्द और गरीबों का था मसीहा
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रजनीश त्यागी
बिजनौर। सात जुलाई 1924, यानी आज के ही दिन गरीबों के रॉबिन हुड और अंग्रेजों के लिए बड़ी मुसीबत बने सुल्ताना डाकू को फांसी दी गई थी। मुरादाबाद के हरथला गांव में जन्मे सुल्ताना ने 17 साल की उम्र में ही डकैतों का गिरोह बना लिया था। कहा जाता है कि उनका जन्म भातु जाति में हुआ था, शारीरिक कद भले ही बड़ा नहीं था, लेकिन अंग्रेजों की नाक में दम करने वाले सुल्ताना डाकू की गूंज ब्रिटिश हुकूमत के उच्च स्तर तक थी। नजीबाबाद में नजीबुद्दोल्ला का किला, वर्तमान का राजा जी पार्क, कार्बेट पार्क उसके छिपने के ठिकाने रहे थे। थाना नांगल में आज भी उसके खिलाफ दर्ज मुकदमा रिकॉर्ड के रूप में मौजूद है।
बिजनौर में सुल्ताना डाकू का नाम आता है तो जहन में नजीबाबाद के नजीबुद्दोल्ला के किले की तस्वीर सामने आने लगती है। यदि बात सुल्ताना की तस्वीर की करें तो लंबे समय से एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर है, जो तमाम माध्यमों से सुल्ताना डाकू के परिचय, सोशल मीडिया आदि पर उपलब्ध है। इसमें अंग्रेजी हुकूमत के समय के छह पुलिसकर्मियों के बीच में करीब पांच फीट लंबाई का सांवला व्यक्ति खड़ा है। इस तस्वीर को देखकर भले ही कोई विश्वास न करें कि जिसके नाम से उस समय के पूंजीपति, ब्रिटिश अफसर कांपते थे, वह ऐसा होगा। लेकिन यही सच्चाई थी। प्रसिद्ध शिकारी जिम कार्बेट ने अपनी किताब माय इंडिया में सुल्ताना को सुल्ताना इंडियाज रॉबिनहुड बताया है। उसमें जिक्र है कि सुल्ताना ने गरीबों को कभी नहीं लूटा, बल्कि अंग्रेजों से लूटे धन से गरीबों की मदद की थी। यही कारण था कि सुल्ताना को लेकर किसी ने मुखबिरी नहीं की थी। सुल्ताना पर कई फिल्में भी बनीं, जिनमें से एक में दारा सिंह ने सुल्ताना का रोल निभाया था। (संवाद)
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सुल्ताना की डकैती का गवाह नांगल थाना
जिले के थाना नांगल में मुकदमा संख्या 25/1922, जी हां यह वहीं मुकदमा संख्या है, जिसमें सुल्ताना डाकू समेत 70-80 डकैतों के खिलाफ जालपुर गांव में शिब्बा सिंह के घर डकैती डालने का मुकदमा दर्ज है। इस डकैती में 17248 रुपये लूटे गए थे। धारा 397 में दर्ज यह मुकदमा फारसी भाषा में दर्ज हुआ था, जिसका बाद में उर्दू और हिंदी में अनुवाद किया गया। इस मुकदमे का हिंदी अनुवाद भी थाने में मौजूद हैं। थाने के रिकॉर्ड की बात करें तो इस मामले में कन्हैया, फूल सिंह, रामस्वरूप, छंगा आदि को डकैती के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया। मुकदमे में यह घटना 22 मई 1922 की रात की बताई गई थी।
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फ्रेडी यंग और जिम कार्बेट को सौंपा गया मिशन सुल्ताना
इतिहास के जानकार बताते हैं कि सुल्ताना डाकू से परेशान ब्रिटिश सरकार ने फ्रेडी यंग नाम के अफसर को मिशन सुल्ताना पर लगाया था। इसके बाद उनके इस मिशन में जिम कार्बेट भी जुड़ गए, जो एक प्रसिद्ध शिकारी, जंगल के जानकार भी थे। इस मिशन के तहत 14 दिसंबर 1923 को नजीबाबाद के जंगलों में सुल्ताना और उसके 15 साथी गिरफ्तार कर लिए गए। आगरा में दी गई फांसी सुल्ताना डाकू पर नैनीताल अदालत में मुकदमा चलाया गया। संक्षिप्त ट्रायल हुआ और सुल्ताना को फांसी की सजा और करीब 40 मददगारों को काला पानी की सजा दे दी गई। इसके बाद 7 जुलाई 1924 को आगरा जेल में सुल्ताना को फांसी पर लटका दिया गया। कहा जाता है कि पहले बिजनौर जेल में सुल्ताना को रखने की तैयारी की गई थी, जिसके लिए तन्हाई बैरक भी बनी, लेकिन किसी कारण सुल्ताना को यहां नहीं रखा गया। इसके बाद सुल्ताना पर कई किताब लिखी गईं। जैसे सुल्ताना डाकू द इंडियाज रोबिन हुड, कंफेशन ऑफ सुल्ताना डाकू आदि शामिल हैं। लखाराम शर्मा की सुल्ताना डाकू किताब के आधार पर जो नौटंकी बनी, वह लंबे समय तक चर्चित रही।
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