डीजे के शोर में गुम हो रही ढोल की थाप और रागिनी
बिजनौर। फाल्गुन माह में होली पर्व का उमंग एक से दो सप्ताह पहले दिखाई देने लगता था। बुजुर्गों की टोलियां चौपालों व चौराहों पर एकत्र हो जाती थीं और फिर ढोल की थाप पर होली की रागिनी और आला उदल के किस्से गाए जाते थे। ढोल बजाने वाले भी इतने अभ्यस्त थे कि रागिनी के सुर के साथ ही उनके ढोल की थाप बजती थी। आधुनिकता के दौर में डीजे, फिल्मी गीतों के शोर में पुरानी रागिनी कम सुनाई दे रही हैं। होली पर्व की रात को ही कुछ बुजुर्ग होलिका दहन के दौरान ही गाते हैं।
दो-तीन दशक पहले गांवों में होली खेले रघुवीरा अवध में, होली खेले रघुवीरा, आई होली आई रे, आल्हा उदल के किस्से व उनके नायकों के चरित्र पर रागिनी बुजुर्ग गाते थे। इस मौके पर बुजुर्गों के गीत व ढोल की थाप पर युवा व बच्चे नाचते थे। इन रागिनियों का अभ्यास करने लगते थे। रात को कई कई घंटे यह होता था और इसमें महिलाएं, बच्चें सब जुड़े रहते थे। अब युवा व बच्चे डीजे की धुन पर नाचते दिखाई देते हैं। बाजार में दुकानों पर रंग, गुलाल व अन्य सामान खूब दिखाई दे रहे हैं। होली पर कई दिन से बाजार रंगोत्सव के स्वरूप में दिखाई दे रहे हैं।
तीन सप्ताह पहले शुरू हो जाता था महोत्सव
कंभौर निवासी ताहर सिंह एवं राजपाल सिंह कहते है कि होली पर दो-तीन सप्ताह पहले ही रागिनी गाई जाती थी। कुछ ग्रामीण ढोल व अन्य वाद्य यंत्रों को बजाकर म्यूजिक देते थे। कई व्यक्ति गायक के बाद रागनी को गा कर सुर देते थे। परिवार की महिलाएं, बच्चे एकत्र हो जाते थे। ग्राम पट्टी निवासी तेगबहादुर सिंह कहते हैं कि होली का उमंग काफी समय से दिखाई देता था। त्योहार आधुनिकता के दौर में अपना स्वरूप बदल रहे हैं। गांवों में ढोल की थाप व रागिनी की जगह डीजे के गीत बजते हैं। होली व रंग के दिन गांवों से शहर तक डीजे का ही शोर रहता है।