झालू की सुषमा गुप्ता विदेशों में बढ़ा रही हिंदी का गौरव
बिजनौर। झालू निवासी सुषमा गुप्ता पिछले 45 वर्षों से विदेशों में हिंदी की पताका फहरा रही हैं। वह जिस देश में भी रहीं उस देश में ही हिंदी का प्रसार किया। उन्होंने, करीब दो हजार विदेशी लोक कथाओं का हिंदी में अनुवाद किया। उन्होंने सौ से भी अधिक पुस्तकों का संकलन किया है।
झालू निवासी सुषमा गुप्ता के पति देवेंद्र गुप्ता तेल कंपनी ओएनजीसी में कार्यरत रहे। इस दौरान उनका तबादला कई ऐसे अहिंदी भाषी राज्यों में हुआ, जहां हिंदी संपर्क की भाषा नहीं थी। पुदुचेरी और तमिलनाडु में प्रवास के दौरान उन्होंने स्थानीय लोगों को हिंदी से जोड़ने का प्रयास किया। सन 1976 में वह पति के साथ नाइजीरिया चली गई और उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ इबादन से लाइब्रेरी साइंस में एमएलएस किया और थियोलॉजिकल कॉलेज में लाइब्रेरियन का कार्य करने लगी। उन्होंने महसूस किया कि वहां भारतीय लोग तो काफी हैं, लेकिन हिंदी का प्रसार कम है। उन्होंने हिंदी के प्रसार के लिए कार्य करना शुरू किया। इस दौरान उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखीं। नाइजीरिया के बाद इथोपिया और फिर लिसोथो में उन्होंने हिंदी के लिए कार्य किया। सूरीनाम में लाखों की संख्या में हिंदीभाषी लोग रहते थे। उन्होंने छोटी-छोटी कहानियों और दंत कथाओं के माध्यम से लोगों को हिंदी से जोड़ना शुरू किया। उन्होंने जर्मनी, रूस, चीन, फ्रांस, इटली, अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका के देशों की लोक कथाओं को संकलित करना शुरू किया। वह अब तक दो हजार से अधिक लोक कथाएं लिख चुकी हैं। उनकी लोक कथाओं का संकलन ‘देश-विदेश की लोक कथाएं’ शृंखला में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है।
सुषमा गुप्ता ने रैवन की लोक कथाएं, राजा सोलोमन, मकेडा की रानी शीबा जैसी तमाम किताबें लिखी हैं। जीवन के 80 बसंत देख चुकी सुषमा गुप्ता आज भी लेखन कार्य में व्यस्त हैं। वर्तमान में वह कनाडा के विंडसर शहर में रहती हैं। सुषमा गुप्ता बताती है कि उनकी लोक कथाओं की कई पुस्तकें अमेरिका और कनाडा के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल हैं। उनका कहना है कि उन्होंने बेहद सरल हिंदी में कहानियां लिखने का प्रयास किया है, जिससे अहिंदी भाषी तथा कम हिंदी जानने वाले लोग भी कहानियों से जुड़ जाते हैं। वह बताती हैं कि आज हिंदी का प्रसार पूरे विश्व में फैल रहा है तथा हिंदी भाषा अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में उभर रही है।