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हजार महीने से बढ़कर है शब-ए-कद्र

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हजार महीने से बढ़कर है शब-ए-कद्र
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नींदडू़। रमजान महीने में एक रात शब-ए-कद्र कहलाती है। इस रात में इबादत करने का सवाब (पुण्य) एक हजार महीने की इबादत से बढ़कर है। रमजान का आखिरी अशरा (10 दिन) जहन्नुम से खुलासी का है। इस अवधि में मस्जिद में एकाग्र मन से इबादत व एकांतवास को एतकाफ कहते हैं। एतकाफ वाले शख्स को शब-ए-कद्र हासिल होने की उम्मीद रहती है।
मुफ्ती मोहम्मद अशरफ मजाहिरी ने बताया कि शब-ए-कद्र की इबादत एक हजार महीने की इबादत से बढ़कर है। यह वर्ष में कभी भी हो सकती है, लेकिन इसके रमजान में होने की ज्यादा उम्मीद है। उलमा ने इस रात को रमजान के अंतिम अशरे की ताक़ (अक्रमागत) रातों में होने का इमकान जताया। शब-ए-कद्र को रमजान के 21वें, 23वें, 25वें, 27वें और 29वें रोजे की रात में तलाश करने को बेहतर बताया है।
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मुफ्ती मोहम्मद मुजम्मिल हुसैन कासमी ने बताया कि रमजान का एतकाफ सुन्नते मौअक्कदा अलल किफाया है। हर मोहल्ले की मस्जिद में एतकाफ करना बेहतर है। शहर या बस्ती की मस्जिद में एक व्यक्ति द्वारा एतकाफ करने से एतकाफ की सुन्नत अदा हो जाती है। इसके लिए 20वें रोजे का सूरज छिपने से पहले एतकाफ की नीयत करके मस्जिद में बैठना जरूरी है। औरतें अपने घरों में एतकाफ कर सकती हैं।
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मुफ्ती मोहम्मद कासिम ने बताया कि रमजान का आखिरी अशरा जहन्नुम से छुटकारे का है। अपने गुनाहों से माफी के लिए इस अशरे में ज्यादा से ज्यादा इबादत की जानी चाहिए। शब-ए-कद्र की रात को पौशीदा रखा गया है, ताकि इस रात की बरकतें हासिल करने के लिए ज्यादा रातों में जागकर इबादत की जा सके। ईद का चांद दिखने के बाद की रात (चांद रात) में इबादत करने का बहुत सवाब है।
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