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स्वतंत्रता संग्राम में बिजनौर के सरदार बख्त खान की थी बड़ी भूमिका

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स्वतंत्रता संग्राम में बिजनौर के सरदार बख्त खान की थी बड़ी भूमिका
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कोतवाली देहात। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 31 मई 1857 को शुरू होना था लेकिन समन्वय के अभाव में 10 मई 1857 को ही शुरू हो गया। जहां इस संग्राम का नेतृत्व अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर ने किया वहीं, बिजनौर निवासी सरदार बख्त खान ने अपने खून के आखिरी कतरे तक को देश के लिए कुर्बान कर दिया था।
बिजनौर इतिहास के जानकार तैय्यब अली बताते हैं कि बख्त खान का जन्म बिजनौर के नजीबाबाद में हुआ था। बख्त खान रोहिल्ला पठान नजीब उल दौला के भाई अब्दुल्ला खान के बेटे थे। जब मेरठ में सैनिक विद्रोह हुआ उस समय 1 जुलाई 1857 को बख्त खान अपने लाव लश्कर के साथ दिल्ली को रवाना हुए और बहादुर शाह जफर को देश का सम्राट घोषित कर दिया गया। सम्राट के बड़े बेटे मिर्जा मुगल को मुख्य जनरल का खिताब दिया गया। यही वह समय था जब बख्त खान दिल्ली पहुंचे और नेतृत्व की स्थिति में सुधार हुआ।
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सम्राट बहादुर शाह जफर ने उन्हें वास्तविक अधिकार और साहेब ए आलम बहादुर का खिताब दिया। इसके बाद बख्त खान के नेतृत्व में लंबी जंग लड़ी गई। बख्त खान ने बहादुर शाह जफर को सुरक्षा प्रदान की। अंग्रेजों की ओर से आत्मसमर्पण के प्रयास हो रहे थे। 20 सितंबर1857 को अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर रंगून जेल भेज दिया। तब बख्त खान ने दिल्ली छोड़ दी और लखनऊ और शाहजहांपुर में विद्रोही बलों में शामिल हो अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ते रहे। अंतिम दिनों में बख्त खान स्वात घाटी में बस गए थे।13 मई 1859 को गंभीर रूप से घायल हो गए। बख्त खान को वर्तमान पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में दफनाया गया। इस तरह बिजनौर की सरजमीं पर जन्में बख्त खान को जन्मस्थान पर कोई सड़क भी मयस्सर न हो सकी, जबकि बख्त खान प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े सेनानियों में से एक रहे।
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