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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे रतन जैन

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पढ़ाई के समय ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए थे रतन जैन
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बिजनौर। यूं तो देश के लिए स्वतंत्रता के हवनकुंड में प्राणों की आहुति देने वालों की सुची काफी लंबी है। जिले के ही रतन जैन भी एक ऐसा नाम है, जो स्वतंत्रता आंदोलन से अपने कॉलेज के समय में ही जुड़ गए थे।
जनपद में कांग्रेस के संस्थापक सदस्य और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे रतन जैन का जन्म अफजलगढ़ में सन 1892 को हुआ था। मात्र 13 वर्ष की आयु में इनके ऊपर से माता पिता का साया उठ गया। इनके फूफा बिजनौर के लाला हीरालाल जैन ने इनका पालन पोषण किया। कॉलेज में अध्ययन के दौरान ही ये स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ गए। पढ़ाई पूरी होने के बाद इन्होंने सन 1917 में नगीना में वकालत शुरू की। 1921 में जब जनपद में कांग्रेस संगठन अपनी जड़ जमाने के लिए योग्य कार्यकर्ताओं की तलाश में था। तब रतनलाल जैन इसके लिए आगे आए। उन्होंने संगठन को पूरा समय देना शुरू कर दिया और थोड़े समय में ही अपनी नेतृत्व क्षमता सिद्ध कर दी।
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बिजनौर के इतिहास के जानकार हेमंत कुमार बताते हैं कि इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीएससी और एलएलबी पूरी की। सन 1924 में गंगा स्नान के अवसर पर उन्होंने सत्याग्रह कर संघर्ष जीवन की शुरुआत की। इसमें इन्हें 200 रुपये जुर्माना भुगतना पड़ा। इस रकम को सरकार ने कुर्की के माध्यम से वसूला।1930 में रतनलाल जैन को जिले में नमक आंदोलन का प्रथम संचालक बनाया गया। इनके नेतृत्व में 30 अप्रैल 1930 को विशाल रैली की गई। इसके कारण इन्हें एक साल कठोर कैद हुई तथा 500 रुपये जुर्माना लगा। 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में इन्हें डेढ़ साल कठोर कारावास और 700 रुपये का जुर्माना हुआ। थोड़े समय बिजनौर जेल में रख कर इनको बरेली जेल भेज दिया गया। वहां कैदी सेनानियों के भोजन में भेदभाव के खिलाफ संघर्ष करने के कारण फैजाबाद जेल ट्रांसफर कर दिया गया।
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आठ माह के लिए कर दिया था नजरबंद
1941 में सत्याग्रह आंदोलन करने के कारण इनको आठ माह के लिए नजरबंद कर दिया गया और 150 रुपये जुर्माना लगाया गया। आठ अगस्त 1942 की रात को अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा हुई और अगले दिन सुबह ही पुलिस ने इनको गिरफ्तार कर डेढ़ साल के लिए जेल भेज दिया। ये तीन बार कांग्रेस के जिलाध्यक्ष बनाए गए। रतनलाल जैन सन 1937 में विधान परिषद और सन 1952 में विधान सभा के सदस्य रहे। सन 1976 में इनका देहांत हो गया।
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