गजरौला शिव। अब गांवों में रात को होली खेलना गुजरे जमाने की बात हो गई है। युवा पीढ़ी पुरानी परंपरा को भूल रही है, समय बीतने के साथ ढोल की थाप पर होली गायन की धुन भी धीमी पड़ती जा रही है लेकिन स्वाहेड़ी के बुजुर्ग होली-दुल्हैड़ी पर होली गायन की परंपरा संजोए हुए हैं। पहले गांव के लोगों के साथ मुस्लिम भी होली खेलते थे। इतना ही नहीं स्वाहेड़ी में आर्य समाज से जुड़े लोगों के घरों में वातावरण को शुद्ध करने के लिए होली पर यज्ञ किया जाता है, भोज के बाद दोपहर बाद शोकाकुल परिवार के घर जाकर शोक उठाते हैं।
स्वाहेड़ी निवासी धीरेंद्र सिंह बताते हैं कि गांव में 10 लोगों की टोली होती थी, जिसमें संतराम सिंह ढोल, दिलावर सिंह बीन, बिशंभर सिंह ढप, जयपाल सिंह बोरे बजाते थे। तेजपाल सिंह, रामसिंह, गढ़ी बगीची निवासी परवीन सिंह, राम सिंह आदि लोग होली गाते थे। जबकि गांव के ढोला लंहगा पहनकर व राजेश दुल-दुल घोड़ा बनकर नाचते थे। मुस्लिम धोबी दुल्ली, मेंहदी हसन, इमरान, काले होली में सुर में सुर मिलते थे। मस्जिद में अजान देने वाले मजीद हाफिज भी हुलियारों के साथ होली खेलते थे।
चरन सिंह का कहना है कि गांव में होली परंपरा को जिंदा रखने के लिए कुछ बुजुर्ग संतराम सिंह, तुख्मान सिंह, राम सिंह, बुद्धू सिंह आदि इकट्ठा होकर ढपली बजाते हुए होली गीत गाते हैं। वे गांव में चली आ रही परंपरा को संजोए हुए हैं। विनोद कुमार बिट्टू बताते हैं गांव में किसी परिजन की मौत से शोकाकुल परिवार में जाकर शोक उठाने की परंपरा है।