ऑक्सीजन की ओवरडोज से सांस लेना भूल रहे फेफड़े
बिजनौर। ऑक्सीजन को लेकर हर जगह मारामारी मची हुई है। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इसी ऑक्सीजन की ओवरडोज के कारण मरीजों की जान पर खतरा बन रहा है। बिना विशेषज्ञ की सलाह के लगाई गई ऑक्सीजन से फेफड़े सांस लेना ही भूल रहे हैं। जी हां, इस संबंध में विशेषज्ञ चिकित्सकों ने चेतावनी दी है कि झोलाछापों के चक्कर में पड़कर मरीजों की जान खतरे में डाली जा रही है।
पिछले 15 दिनों मे कोरोना के केस बढ़ने के साथ ही ऑक्सीजन की खपत भी बढ़ गई है। प्राइवेट नर्सिंग होम में ऑक्सीजन खत्म हो गई, लोगों ने अपने मरीजों के लिए ऑक्सीजन सिलिंडर स्टोर करके रख लिए। हालात अभी बहुत ज्यादा नहीं बदले हैं, लेकिन यह बहुत कम लोग जानते हैं कि जीवनदायिनी ऑक्सीजन ही गलत तरीके से ली जाए तो जान की दुश्मन बन सकती है।
फेफड़ों को करने दें उनका काम
वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ नीरज चौधरी कहते हैं कि फेफड़ों द्वारा सांस लेना एक अनवरत प्रक्रिया है। कोरोना या अन्य बीमारी में जब ऑक्सीजन का स्तर गिरता है तो शुरूआत में प्राकृतिक तरीके से ही उसे बढ़ाना चाहिए। यदि फायदा नहीं हो तो ही ऑक्सीजन लगाई जाती है। ऐसे में यदि मरीज को बिना जांच किए और मानक के अनुरूप ऑक्सीजन नहीं दी जाए या कम या ज्यादा दी जाती है तो भी नुकसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि ऑक्सीजन लगाने से पहले विशेषज्ञों की राय जरूर लेनी चाहिए।
मुंह, नाक में बढ़ जाती है ड्राइनेस
शहर के वरिष्ठ सर्जन डॉ. प्रकाश सिंह कहते हैं कि हमें मरीज के फेफड़ों में इंफेक्शन और शरीर के ऑक्सीजन लेवल को देखकर तय करना होता है कि कितना फ्लो रखा जाए। आजकल यह फ्लोमीटर ज्यादातर लोग देख ही नहीं रहे हैं। ऐसे में तेज फ्लो होने पर मुंह, नाक में ड्राइनेस, नाक से खून आना, अल्सर होना आदि की समस्या भी बढ़ जाती है। इसलिए विशेषज्ञ की सलाह बहुत जरूरी है।
जरूरत से कम ऑक्सीजन, मतलब खतरा
विशेषज्ञ कहते हैं कि कई बार जब शरीर का ऑक्सीजन लेवल 75 से 80 होता है तो फेफड़ों के इंफेक्शन का प्रतिशत देखकर ही फ्लो दस से 15 रखा जाता है। इसके अलावा 89 से 90 तक ऑक्सीजन लेवल है तो फ्लो लेवर चार तक भी काम करता है। ऐसे में सतर्कता बरतनी बहुत जरूरी है। काफी लंबे समय तक ऑक्सीजन पर रहने वाले मरीज को यदि ऑक्सीजन से हटा दें तो उसकी जान को भी खतरा हो सकता है।