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वेव ग्रुप की मिलों ने रकबे के लिए नहीं किया आवेदन

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वेव ग्रुप की मिलों ने रकबे के लिए नहीं किया आवेदन
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बिजनौर। पिछले साल गन्ना पेराई से हाथ खड़ा करने वाली वेव ग्रुप की बिजनौर और चांदपुर चीनी मिल ने इस साल फिर से मिल संचालन को लेकर असमंजस की स्थिति खड़ी कर दी है। ग्रुप की दोनों मिलों ने आगामी पेराई सत्र के लिए गन्ने का रकबा और सेंटर नहीं मांगे हैं। गन्ना विभाग के अधिकारियों ने मिल अफसरों को तलब कर लिया है। हालांकि मिल के अफसर इस पर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं।
जिले में नौ चीनी मिलों को तीन लाख 34 हजार से ज्यादा किसान गन्ना आपूर्ति करते हैं। जिले में दो लाख 17 हजार हेक्टेयर जमीन में गन्ना बोया जाता है। गन्ना आयुक्त ने पेराई सत्र 2019-20 के लिए चीनी मिलों से गन्ना रकबा और गन्ना क्रय केंद्रों का आवेदन 31 अगस्त तक मांगे थे। जिले की सात चीनी मिलों ने तो रकबे के लिए गन्ना आयुक्त के यहां आवेदन कर दिए हैं, लेकिन वेव ग्रुप की बिजनौर और चांदपुर चीनी मिल ने रकबे के लिए आवेदन नहीं किया है। पिछले साल भी वेव ग्रुप ने चीनी मिलों को चलाने से हाथ खड़े कर दिए थे। इस संबंध में शासन को पत्र भी लिख दिया था। मिल की बिक्री के मामले में पहले से ही सीबीआई जांच चल रही है। पिछले साल भी ग्रुप ने मिलों का संचालन न करने की बात कहकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की थी, लेकिन सरकार तब दबाव में नहीं आई थी। इस बार भी ग्रुप के अफसर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। मिलों के गन्ना रकबा के लिए आवेदन न करने से गन्ना विभाग के अफसर भी सतर्क हो गए हैं। यह पूरा माला शासन व प्रशासन के सामने रख दिया गया है। देखा जा रहा है कि मिलों ने किसलिए रकबा लेने में दिलचस्पी नहीं ली है। हालांकि दोनों चीनी मिलों में अगले पेराई सत्र के लिए मरम्मत का काम काफी समय से चल रहा है।
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मिल पर करोड़ों रुपये हैं बकाया
मिलों पर अब भी करोड़ों रुपया बकाया है। बिजनौर चीनी मिल ने पिछले साल 110.83 करोड़ का गन्ना खरीदा था। इसमें से 57.49 करोड़ का ही भुगतान किया गया है। 53.33 करोड़ बकाया है। चांदपुर चीनी मिल ने 180.26 करोड़ का गन्ना खरीदा था। इसमें से 78.61 करोड़ का भुगतान हुआ है और 101.64 करोड़ रुपये बकाया है।
कौड़ियों के दाम बिकी थीं मिल
साल 2010 में बसपा सरकार में सरकारी क्षेत्र की बिजनौर और चांदपुर चीनी मिल को कौड़ियों के दाम वेव ग्रुप को बेच दिया गया था। बिजनौर चीनी मिल को 50.60 करोड़ तथा चांदपुर चीनी मिल को 85.20 करोड़ में बेचा गया था। तब इन दोनों मिलों की जमीन की ही कीमत अरबों रुपये है। तब इनमें करोड़ों रुपये की चीनी और मशीनें लगी थीं। भाजपा सरकार मिल बिकने के मामले की सीबीआई जांच करा रही है।
हजारों किसान जुड़े हैं मिलों से
गन्ना विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार बिजनौर शुगर मिल से 9600 किसान जुड़े हैं। इन किसानों का आठ हजार 22 हेक्टेयर जमीन में खड़ा गन्ना मिल में पेराई के लिए दिया जाता है। इसके अलावा चांदपुर शुगर मिल में 16 हजार किसान गन्ना देते हैं। इस मिल में 14 हजार 773 हेक्टेयर जमीन में खड़े गन्ने की पेराई होती है।
दोनों मिलों को नहीं मिला सॉफ्ट लोन
वेव ग्रुप की चांदपुर और बिजनौर चीनी मिलों के खिलाफ सीबीआई जांच के चलते सॉफ्ट लोन का पैसा दोनों मिलों को भुगतान के लिए नहीं मिला। सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग के अनुसार विवाद संपत्ति पर लोन नहीं दिया जा सकता है। मिलों को बैंक से सीसीएल भी मुश्किल से मिलती है।
बना रहे हैं आगे की रणनीति
बिजनौर चीनी मिल के एक अफसर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सरकार से मिलने वाली सॉफ्ट लोन व अन्य सुविधाओं का लाभ मिल को नहीं मिल रहा है। गन्ना भुगतान करने में बहुत समस्या खड़ी हो रही है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर आगे की रणनीति बनाई जा रही है। चांदपुर चीनी मिल के गन्ना महाप्रबंधक तेजवीर सिंह ढाका ने बताया कि यह मामला ग्रुप के लखनऊ में बैठे अफसर देखते हैं। इसके बारे में उन्हें ज्यादा नहीं पता है।
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डीएम ने किया तलब
जिला गन्ना अधिकारी यशपाल सिंह के अनुसार दोनों चीनी मिलों की स्थिति के बारे में शासन को बता दिया गया है। डीएम ने दोनों मिलों के अफसरों को तलब करके रकबे का प्रस्ताव भेजने के निर्देश दिए हैं।
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