गोदान को समालोचकों ने नकारा तो पद्म सिंह की समीक्षा ने दिया सहारा
बिजनौर। मुंशी प्रेमचंद का बिजनौर से काफी लगाव रहा। बिजनौर के प्रसिद्ध समीक्षक और समालोचक पद्म सिंह शर्मा से मुंशी प्रेमचंद्र की मित्रता रही। उन्होंने प्रेम चंद को उपन्यास सम्राट बनाया।
प्रेमचंद के उपन्यास गोदान को जब समालोचकों ने नकारा तो पद्म सिंह शर्मा ने उन्हें सहारा दिया। जिसके बाद प्रेमचंद ने कहा था कि पंडित जी आप समीक्षा न करते तो मुझे हिंदी के साहित्यकारों ने मार ही दिया था।
जनपद के साहित्यकार अमन त्यागी बताते हैं कि जिस समय मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य सृजन शुरू किया, उस समय उर्दू का बोलबाला था। जब मुंशी प्रेमचंद का उपन्यास गोदान प्रकाशित हुआ तो उसकी हिंदी के कई समालोचकों ने आलोचना की। उसे एक सिरे से नकार दिया।
पद्म सिंह शर्मा ज्वालापुर महाविद्यालय में अध्यापन कार्य करते थे। उन्होंने गोदान पढ़ा। उसकी समीक्षा की। यह समीक्षा कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई। इसके बाद मुंशी प्रेमचंद के कई उपन्यासों की समीक्षा पंडित पद्म शर्मा ने की।
अमन त्यागी बताते हैं कि मुंशी प्रेमचंद ने पद्म सिंह शर्मा से कहा भी है कि पंडित जी अगर आप समीक्षा न करते तो मुझे हिंदी के साहित्यकारों ने मार ही दिया था। प्रेम चंद एक बार ज्वालापुर महाविद्यालय में भी आए थे। वहां उन्होंने आम का एक पेड़ रोपा था।
आरएसएम महाविद्यालय धामपुर के सेवानिवृत्त हिंदी के शिक्षक डॉक्टर शंकर शर्मा क्षेम का कहना है कि मुंशी प्रेमचंद के नाम से इतिहासकारों ने हिंदी का एक युग बताया है। इसलिए वह हिंदी के युगपुरुष हैं। मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य को नई ऊंचाई दी। उनकी पुस्तकों का हिंदी के अलावा कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। मुंशी प्रेम चंद के किसान पात्रों को गोबर से बदबू नहीं आती, उनके गोदान जैसे उपन्यासों के पात्र- होरी, धनिया, गोबर, झुनिया, रूपा, सोना आज भी जीवित हैं। समाज का स्वर बनकर हमें याद रहते हैं। आज भी अपनी बात सहज में पाठकों के मन तक पहुंचाने वाले हिंदी कथा सम्राट प्रेमचंद आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने प्लेग (ताऊन) की महामारी के बाद थे।
जवाहर नवोदय विद्यालय चांदपुर में हिंदी के शिक्षक तथा दोहा लिखने वाले जयवीर सिंह यादव का कहना है कि मुंशी प्रेमचंद ने अपने साहित्य सृजन से दबे कुचले वर्ग की आवाज बुलंद की। उन्होंने गुलाब भारत में साहित्य सृजन कर स्वतंत्रता की चिंगारी भी अपने लेखन के माध्यम से जलाए रखी।
शिक्षक एवं साहित्यकार डॉ अशोक शर्मा का कहना है कि मुंशी प्रेमचंद ने अपने लेखन के माध्यम से कुप्रथाओं पर निरंतर प्रहार किया। विधवा विवाह और और सामंती सोच रखने वाले व्यक्तियों पर जमकर कटाक्ष किए। उनका लेखन आज भी प्रासंगिक है।