बरुकी के ग्राम खुरर्मपुर में सूत कातता कारीगर।
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खत्म होने के कगार पर खादी की खड्डी
बरुकी। क्षेत्र में एक समय करोड़ों रुपये की आय देने वाला तथा सैकड़ों लोगों को रोजगार से जोड़ने वाला खादी का काम ऑर्डर न मिलने की वजह से न्यूनतम स्तर पर आ गया है। क्षेत्र में खादी के कपड़े का बहुत बड़ा बाजार हुआ करता था। 20 साल पहले हजारों लोग खादी के कारोबार से जुड़े थे। वर्तमान में खादी की मांग घटने तथा कपड़ा फैक्टरियों के बढ़ते प्रभाव के चलते खादी के कपड़े बनने वाली खड्डी खत्म होने के कगार पर हैं और बुनकर रोटी रोजी को लेकर परेशान हैं।
गांव खुर्रमपुर के बुनकर इरशाद अहमद की अपनी खड्डी है। इस पर वह कपड़ा तैयार करते हैं। वह बताते हैं कि वर्तमान में मजदूरी निकलना भी कठिन हो रहा है। लॉकडाउन में बिल्कुल भी आर्डर नहीं मिला। यदि खादी का कपड़ा बुनने का आर्डर मिलता है तब उसकी मजदूरी 10 रुपये मीटर मिलती है, जबकि रुमाल आदि बनाने के लिए मिलने वाले ऑर्डर की मजदूरी मात्र चार रुपये मीटर मिलती है। एक दिन में 12 से 15 मीटर कपड़ा बुना जाता है। इसी गांव के शफीक अहमद बताते हैं कि क्षेत्र में निसार अहमद नाम का व्यक्ति ऑर्डर लाता था। निसार खुद 10 खड्डी चलाता था तथा क्षेत्र में दो दर्जन से अधिक खड्डी वाले निसार के लिए कपड़ा बुनकर देते थे। लेकिन कुछ समय पूर्व निसार बीमार पड़ गया। इससे उनका आर्डर नहीं आ पाया। गांव पेरूवाला में खड्डी चलाने वाले हफीजुद्दीन बताते हैं कि क्षेत्र में नरगदी, नवादा, मंगोलपुरा, कादीपुरा, पटपड़ा सहित दो दर्जन गांव में सैकड़ों लोग कपड़ा बुनने का कार्य करते थे, लेकिन अब खादी की मांग घटने के कारण अधिकांश स्थानों पर खड्डी बंद हो चुकी है। सरकार द्वारा इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
बरुकी के ग्राम खुरर्मपुर में कपड़ा बुनते बुनकर।- फोटो : BIJNOR