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छह साल से वापस हो रहे हीमोफीलिया के इंजेक्शन

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छह साल से वापस हो रहे हीमोफीलिया के इंजेक्शन
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बिजनौर। जिला अस्पताल में बीते छह साल से हीमोफीलिया का कोई मरीज इलाज कराने नहीं आया है। जिला अस्पताल में हर साल दो इंजेक्शन हीमोफीलिक फैक्टर के आते हैं, जो खून का थक्का जमाने में मदद करता है। हीमोफीलिया एक ऐसी बीमारी है, जिसमें व्यक्ति को रक्त बहना खुद शुरू हो जाता है। अच्छी बात यह है कि पिछले छह साल में एक भी मरीज हीमोफीलिया का नहीं आया, इसलिए हर साल सरकार की ओर से आने वाले इंजेक्शन वापस कर दिए जाते हैं। महिलाओं में हीमोफीलिया से लड़ने की क्षमता ज्यादा अधिक होती है।
जिले में इस समय कोई हीमोफीलिया का मरीज नहीं है। सरकार की ओर से हर साल हीमोफीलिक फैक्टर के दो इंजेक्शन आते हैं, लेकिन बीते छह साल से किसी ने भी जिला अस्पताल में आकर इंजेक्शन नहीं लगवाया है, जिसके चलते इंजेक्शन की अवधि खत्म होने से पहले उसे लखनऊ वापस भेज दिया जाता है। चिकित्सकों के अनुसार हीमोफीलिया एक अनुवांशिक बीमारी है, जो पुरुषों में दिखाई देती है। हीमोफीलिया से ग्रसित मरीज को अगर चोट लग जाए तो उसका खून का थक्का नहीं जमता है, जिसकी वजह से कभी-कभी ज्यादा खून बहने से मरीज की मौत भी हो जाती है। हीमोफीलिया का कोई इलाज नहीं है, हालांकि छोटी चोट लगती है तो हीमोफीलिक फैक्टर का इंजेक्शन लगाकर खून का थक्का बन जाता है।
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करीब 10 से 20 हजार रुपये हैं इंजेक्शन की कीमत
हीमोफीलिया से ग्रसित मरीजों को खून का थक्का बनाने के लिए फैक्टर इंजेक्शन लगाया जाता है। बाजार में इसकी कीमत करीब 10 से 20 हजार रुपये होती है। जिला अस्पताल में दो इंजेक्शन होते हैं, लेकिन मरीज न होने के कारण इन इंजेक्शनों को वापस लखनऊ भेज दिया जाता है।
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डेंट क्रोमोसोन में प्राकृतिक बदलाव से होता है हीमोफीलिक फैक्टर : सीएमएस
जिला अस्पताल के सीएसएस डॉ. अरुण कुमार पांडेय ने बताया कि हीमोफीलिया विटामिन K की कमी और हीमोफीलिक फैक्टर की वजह से रक्त का थक्का नहीं बनता है। इसके साथ ही बताया कि यह अनुवांशिक है। हीमोफीलिक फैक्टर डेंट क्रोमोसोन में प्राकृतिक बदलाव की वजह से होता है, जिसकी वजह से थक्का नहीं बनता है।
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