हस्तिनापुर सेंक्चुरी फिर होने लगी बारहसिंगा से आबाद
बिजनौर। सेंक्चुरी एरिया में जिले में बारहसिंगा का कुनबा फिर से बढ़ने लगा है। बारहसिंगा का एक बड़ा झुंड गंगा बैराज पर शीशमहल के पास देखा गया है। झुंड में 23 बारहसिंगा थे। इतनी बड़ी संख्या में बारहसिंगा दिखने पर वन विभाग के अफसर भी गद्गद हैं। जहां बारहसिंगा दिखे वहां पर कुछ लोग सिंचाई विभाग की जमीन पर खेती करने की कोशिश कर रहे थे। वन विभाग ने इनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए एक ट्रैक्टर को कब्जे में लिया है।
हस्तिनापुर वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी 2672 वर्ग किलोमीटर एरिया में है। यह चार जिलों मेरठ, मुजफ्फरनगर, जेपीनगर व बिजनौर में है। वाइल्ड लाइफ क्षेत्र जंगली जानवरों की सुरक्षा के लिए घोषित किया जाता है। डीएफओ डा. एम सेम्मारन ने कहा कि हस्तिनापुर सेंक्चुरी बारहसिंगा व काले हिरन को संरक्षित रखने के लिए बनाई गई है। गंगा किनारे पहले बारहसिंगा के बड़े-बड़े झुंड दिखाई देते थे। इसके अलावा काले हिरन भी क्षेत्र में काफी संख्या में थे। साल 2012 में केदारनाथ आपदा के समय गंगा किनारे खादर में भी बाढ़ ने काफी तबाही मचाई थी। इससे पहले साल 2010 में भी पहाड़ों पर ज्यादा बारिश होने से खादर में बाढ़ आई थी। तब बारहसिंगा व काले हिरन की प्रजाति को बहुत नुकसान हुआ था। केदारनाथ आपदा के समय बारहसिंगा के बड़े-बड़े झुंड बाढ़ के पानी में बह गए थे। तब से क्षेत्र में बारहसिंगा व काले हिरन दिखने लगभग खत्म से ही हो गए थे। कभी कभार कोई बारहसिंगा या काला हिरन दिख जाता, लेकिन इस साल बारहसिंगा से गंगा का खादर क्षेत्र फिर से गुलजार होने लगा है। बारहसिंगा के एक ही झुंड में 23 बारहसिंगा दिखाई दिए हैं। केदारनाथ आपदा के बाद आज तक इतनी बड़ी संख्या में बारहसिंगा नहीं दिखे थे। इसके अलावा काले हिरन भी क्षेत्र में दिख रहे हैं। वन विभाग के अफसर काले हिरन को बचाने के लिए अब सतर्क हो गए हैं। शीशमहल के पास सिंचाई विभाग की सैकड़ों बीघा जमीन है। यहां पर कुछ लोग अवैध तरीके से खेती करने की कोशिश कर रहे थे। रेंजर शरद गुप्ता ने कार्रवाई करते हुए इनके ट्रैक्टर को कब्जे में ले लिया है।
हरिद्वार से जुड़ा है खादर क्षेत्र
गंगा तट का इलाका हरिद्वार से जुड़ा हुआ है। वहां भी काफी संख्या में बारहसिंगा रहते हैं। माना जा रहा है कि जिले में खाने की प्रचुर मात्रा होने के कारण हरिद्वार से बारहसिंगों के झुंड ने रुख किया है। गंगा किनारे उगने वाले झाड़ आदि में इनको सुरक्षित आवास मिल जाता है। गंगा किनारे शिकारी पशु भी नहीं हैं।
रफ्तार और सिंग सुरक्षा के हथियार
बारहसिंगा अपनी फुर्ती के लिए जाना जाता है। यह तीन से पांच मीटर लंबी छलांग लगा सकता है। शिकारी जानवरों से बचने के लिए इसकी रफ्तार व इसके सिंग इसके सबसे बड़े हथियार हैं। सिंग केवल नर के सिर पर होते हैं।
दलदली जमीन है पसंद
बारहसिंगा दलदली जमीन में रहना पसंद करते हैं। इनके खुर मुलायम होते हैं। यह कठोर जमीन में नहीं चल पाते हैं। दलदली जमीन में उगने वाली मुलायम घास इनका पसंदीदा आहार होती है।
फिर से जिले में आ रहे बारहसिंगा
डीएफओ डा.एम सेम्मारन के मुताबिक गंगा किनारे बारहसिंगों का बड़ा झुंड दिखा है। यह एक अच्छा संकेत है। बारहसिंगा अब जिले की ओर फिर से रुख कर रहे हैं। इन्हें संरक्षित करने के लिए कड़े कदम उठाए जा रहे हैं।