बिजनौर। गजेटियर में शामिल जानकारी को प्रमाणिक तथ्य के तौर पर माना जाता है। मगर मुरादाबाद डिविजनल गजेटियर के खंड एक के लेखन में तथ्यों को सच की कसौटी पर नहीं परखा गया। खामियों की भरमार ने तथ्यों की प्रमाणिकता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
2023 में गजेटियर का खंड एक प्रकाशित हुआ, जिसके प्रकाशन में तमाम सरकारी अमला जुटा और इतिहासकारों से भी राय मशविरा किया। गजेटियर प्रकाशन को लेकर जिम्मेदारों ने खूब वाहवाही भी लूटी। मगर तथ्यों की बारीकियों को परखना भूल गए। नतीजा ये हुआ कि कई तथ्य गलत प्रकाशित हो गए। इस गजेटियर में बिजनौर जनपद को लेकर दी गलत जानकारी की बात करें तो पेज 58 तथ्यों में गलती से पर्दा उठा रहा हैं।
साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार अशोक मधुप बताते हैं कि पेज 58 पर लिखा है कि 1857 में बिजनौर को मुरादाबाद जनपद से अलग किया गया जबकि हकीकत में 1817 में बिजनौर को मुरादाबाद से अलग किया गया, और मुख्यालय बनाया था नगीना। इसी पेज पर 13 मई 1857 को होने वाली क्रांति का जिक्र है। जिसमें कहा गया कि कलेक्टर ए शेक्सपियर ने जनपद को अपने अधिकार में लेकर नजीबाबाद को अपना मुख्यालय बनाया जबकि असल में नजीबाबाद कभी मुख्यालय रहा ही नहीं।
किला मोरध्वज को दिखाया मंडावर के नजदीक
पेज 56 पर ही नौंवी लाइन में कहा गया है कि मंडावर के नजदीक मोरध्वज नाम एक अत्यंत प्राचीन स्थल है। असल में मोरध्वज मंडावर से काफी दूर है जोकि नजीबाबाद कोटद्वार के बीच स्थित है। मंडावर से मोरध्वज की हवाई दूरी लगभग 36 किलोमीटर (22.3 मील) है। सड़क मार्ग से जाने पर यह दूरी लगभग 42 से 45 किलोमीटर के बीच बैठती है।
पेज 72 पर भी प्रकाशित की गलत जानकारी
गजेटियर के पेज 72 पर सातवीं लाइन में लिखा है कि 20 वी शताब्दी में सुल्ताना डाकू ने किले पर कब्जा कर लिया था जबकि असल में कब्जा नहीं किया था। हकीकत तो यह थी कि अंग्रेज सरकार ने भातु जाति के लोगों को अपराध की दुनिया से निकालने के लिए उनका सुधार गृह उक्त किले को बनाया था। जो अपराधी यहां पर रखे गए थे, उनमें से एक सुल्तान डाकू के नाम से मशहूर हुआ।
वर्जन...
गजेटियर में जो गलतियां हैं, वह संज्ञान में लाई गई है। जो मिस प्रिंट हुआ है, उसमें बदलाव कराते हुए सही जानकारी लिखवाई जाएगी। संपादित वर्जन आएगा तो सभी गलतियां ठीक करा दी जाएगी। -जसजीत कौर, डीएम बिजनौर