आर्थिक तंगी से जूझ रहे गांधी आश्रम के कर्मचारी
धामपुर। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से संचालित क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम केंद्रीय वस्त्रागार कार्यालय में कार्यरत कर्मचारी आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं। गांव जैतरा में श्री गांधी आश्रम का केंद्रीय वस्त्रागार कार्यालय है। किसी जमाने में यहां पर तैयार होने वाला सूती कपड़ा, चादर, लिहाफ, गद्दे भारी मात्रा में गैर प्रदेशों को निर्यात किए जाते थे। लेकिन सरकार और संस्थान के प्रशासनिक अधिकारियों की उपेक्षा के कारण संस्थान का अस्तित्व खतरे में है। अब यहां कामकाज चौपट हो गया है। कर्मचारियों को समय से वेतन तक नहीं मिल रहा है।
केंद्रीय वस्त्रागार कार्यालय के व्यवस्थापक सुरेंद्र कुमार मिश्रा का कहना है कि गांव जैतरा में करीब चार दशक पहले महात्मा गांधी के नाम से केंद्रीय वस्त्रागार कार्यालय का खोला गया था। इसका केंद्रीय मुख्यालय उत्तराखंड के देहरादून में है। इस वस्त्रागार कार्यालय का प्रशासनिक अमला देहरादून कार्यालय पर रहता है। उनका कहना है कि बार बार पत्राचार करने के बाद भी उनकी कोई सुनवाई नहीं होती है। जब से देश में भारत सरकार ने नोटबंदी लगाई है। तब से खादी के पहले से और बुरे दिनों की शुरूआत हो गई है। वर्तमान में श्री खादी ग्रामोद्योग गांधी आश्रम का केंद्रीय वस्त्रागार कार्यालय दम तोड़ने के कगार पर है। नवंबर-दिसंबर का माह ही होता है, जब उनका कारोबार उड़ान भरता है। लेकिन अब पूरी तरह से दम तोड़ चुका है।
18 प्रतिशत जीएसटी ने निकाला दम
नोटबंदी के बाद लगी जीएसटी ने खादी उद्योग को दिव्यांग कर दिया। प्रतिस्पर्धा के दौर में बाकी और वस्त्रों को छोड़ कर खादी के वस्त्रों पर 18 प्रतिशत जीएसटी है। ऐसा होने से बिक्री धड़ाम हो गई है। ग्राहक खादी ग्रामोद्योग की ओर से महंगाई के चलते मुंह मोड़ कर निकल रहे हैं। मजदूरी न मिलने से लेबर काम छोड़कर जा रही है। वस्त्रागार में सिलाई करने वाले ठेकेदार इकबाल अहमद, मोहम्मद दिलशाद, हनीफ, तसलीम का कहना है कि संस्थान की ओर से उन्हें दो साल से सिलाई का भुगतान नहीं हो सका है। लाखों रुपया उनका संस्थान पर बकाया है। कर्मचारियों का वेतन भी किश्तों में मिल पा रहा है।
बिक्री ठप होने से बदहाली और बढ़ी
यहां पर गैर प्रदेशों से कच्चा माल मंगाकर विभिन्न प्रकार का कपड़ा, लिहाफ, गद्दे, रजाई, कंबल, चादरें, खेस, खादी पॉलिस्टर, ऊनी कपड़ा तैयार कर उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात आदि प्रांतों में ट्रकों से सप्लाई किया जाता है। आश्रम के कर्मचारी गुलाब सिंह, धर्मदेव सिंह चौहान का कहना है कि खादी आश्रम के फुटकर भंडारों पर भी बिक्री ठप है। ग्राहक माल खरीदने नहीं आ रहे हैं। आश्रम में करीब 25 से ज्यादा स्थायी अधिकारी, कर्मचारी हैं। आज उनके परिवार के खर्चे के लिए पैसे भी नहीं हैं।