नजीबाबाद में नवाब नजीबुद्दौला के बसाए नगर में प्राचीन नवाबी इमारतें एक-एक कर अपना अस्तित्व खो रही हैं। धरोहर कही जाने वाली इन इमारतों के बाहर पुरातत्व विभाग के बोर्ड लगे हैं, लेकिन इनकी सुध नहीं लेने से इमारतें तेजी से खंडहर में तब्दील हो रही हैं। कुछ नवाबी इमारतें भूमाफिया की भेंट चढ़ चुकी हैं।
पेशावर में 1707 में जन्मे नजीब खां ने सन 1752 में ऐतिहासिक नगरी नजीबाबाद को बसाया था। नवाब नजीबुद्दौला के नाम से मशहूर हुए नजीब खां और उनके वंशजों ने नजीबाबाद को कई कलात्मक इमारतों का तोहफा दिया। नवाबी कला अनुराग की प्रतीक इमारतों में नवाब नजीबुद्दौला का महल, पत्थरगढ़ का किला, बारहदरी, चार मीनार को जिसने भी देखा, उसने कलात्मक कारीगरी की दृष्टि से दांतों तले उंगली दबा ली। सन 1755 में निर्मित पत्थरगढ़ के किले में सुल्ताना डाकू ने पनाह ली, तो उसे लोग इसी नाम से पहचानने लगे। 14 अक्तूबर 1770 को नवाब नजीबुद्दौला का इंतकाल हुआ।
नवाब नजीबुद्दौला के मकबरे में उनके अवशेष दफन हुए। यहीं पर उनके खानदान से जुड़े लोगों की कब्र भी बनी। ये वो ऐतिहासिक धरोहरें हैं, जो आज अपना अस्तित्व बरकरार रखने में सरकारी उपेक्षा की शिकार हैं।
नवाब खानदान की इमारतों में पठानपुरा-जाब्तागंज क्षेत्र में स्थित बारहदरी नवाबी इमारत पूरी तरह गुमनामी में खो चुकी है। बारह दरों की यह इमारत लोगों के लिए कभी कौतुहल का विषय हो चुकी थी, जिसे भूमाफिया वर्षों पूर्व पूरी तरह निगल चुके हैं। इसी क्षेत्र में ऐतिहासिक धरोहर के रूप में जीर्णक्षीण चार मीनार है, जिसका गुंबद दशकों पूर्व धराशाही हो चुका है। नवाबों का महलसराय क्षेत्र भी इतिहास बन चुका है। यहां पर कुछ बाकी है, तो वह है नगरपालिका कार्यालय के सामने स्थित ऐतिहासिक दरवाजा, जहां पर नवाबों का दरबार चला करता था। बताया जाता है कि यहां से एक सुरंग महावतपुर क्षेत्र स्थित पत्थरगढ़ के किले को जोड़ती थी। सुरंग की स्थिति भी गुमनामियों में खोई हुई है।
पत्थरगढ़ का किला नवाबों के कलानुराग का प्रतीक है। तेजी से यह इमारत भी अपना अस्तित्व खो रही है। किले की दीवारें धीरे-धीरे ध्वस्त हो रही हैं। मरम्मत के नाम पर वर्षों बाद पुरातत्व विभाग बजट नहीं होने की बात कहकर खानापूर्ति कराता है। पत्थरगढ़ का किला, नवाब नजीबुद्दौला का मकबरा और नवाबी महल के मुख्य दरवाजे के बाहर पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित स्मारक के बोर्ड लगाए गए हैं। पत्थरगढ़ के किले के बाहर लगे बोर्ड पर प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल की सुरक्षा से संबंधित कई महत्वपूर्ण निर्देश अंकित हैँ। पुरातत्व विभाग की उपेक्षा से बोर्ड पर अंकित होने तक सीमित हो गए हैं। नवाबों की ऐतिहासिक और धरोहर इमारतें एक-एक कर इतिहास बनने की कगार पर पहुंच रही हैं। हालांकि इनकी सुध लेने वाला फिलहाल कोई नजर नहीं आता। पुरातत्व विभाग यदि नवाबों के बसाए नजीबाबाद की धरोहर इमारतों के संरक्षण और संवर्धन के प्रति गंभीर नहीं हुआ तो वह समय दूर नहीं, जब 21वीं सदी के समाप्त होने तक हमारी धरोहर इन इमारतों में से कई अपना अस्तित्व खो बैठेंगीं।