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श्रीकृष्णायन गोशाला में हो रहा देशी गायों का संरक्षण

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श्रीकृष्णायन गोशाला में हो रहा देशी गायों का संरक्षण
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बिजनौर। गांव सबलगढ़ में बनी श्रीकृष्णायन गोशाला एवं गोलोक धाम देशी गायों का आसरा बना है। गोशाला में देशी गायों को रखने व संवर्धन करने की पूरी व्यवस्था की जा रही है। गोशाला की आमदनी के लिए यहां पर देशी गायों के गोबर से बायोगैस और मूत्र से अर्क बनाया जाता है। उत्तराखंड के लगभग सभी मुख्यमंत्री और यूपी सरकार के मंत्री गोशाला में देशी गायों के संरक्षण को देखने के लिए आते रहते हैं।
उत्तराखंड से यूपी की सीमा में आने के बाद मां गंगा सबसे पहले जिले के भागूवाला क्षेत्र के गांव सबलगढ़ में प्रवेश करती हैं। सबलगढ़ में केवल मां गंगा के प्रवेश के लिए ही नहीं बल्की देशी गायों के संरक्षण के लिए भी प्रसिद्ध हो रहा है। गांव के बाहर की ओर बनी श्रीकृष्णायन देशी गोशाला एवं गोलोक धाम सेवा समिति की गोशालाओं में साढ़े तीन हजार से अधिक देशी गायों का संरक्षण किया जा रहा है। गोशाला में 3664 गाय हैं। सभी गाय केवल देशी हैं। हर रविवार को इनकी गिनती की जाती है तो संख्या हर बार बढ़ी हुई ही मिलती है। गायों को पानी पिलाने, चारे डालने व गोबर हटाने के लिए करीब पांच दर्जन कर्मचारी यहां नियुक्त हैं। गायों को किसी को दिया नहीं जाता है। हालांकि देशी गायों के संवर्धन के लिए नंदी को किसानों को कभी कभी दे दिया जाता है। अगर कोई किसान विदेशी या मिक्स नस्ल की गाय को यहां लेकर आता है तो उसे नहीं लिया जाता है। गोशाला में गोबर से बायोगैस भी बनाई जाती है। इससे बनने वाली गैस से गोशाला में जनरेटर चलाया जाता है। बाद में यह गोबर खाद में इस्तेमाल होता है।
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गोशाला में इस नस्ल की गाय हैं मौजूद
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. भूपेंद्र सिंह के अनुसार गोशाला में गिर, राठी, हरियाणा, थारपारकर, कांक्रेज, साहिवाल, मेवाती, पहाड़ी गाय, लाल सिंधी सहित देशी गायों की करीब 14 प्रजाति हैं। यहां पर अब सभी नस्ल के गोवंश को अलग अलग रखने की तैयारी की जा रही है ताकि गायों की नई नस्ल मिक्स न हों। गोशाला में गायों को हर रोज करीब 110 क्विंटल भूूसा दिया जाता है। करीब चार से पांच ट्राली गोबर यहां से प्रतिदिन निकलता है। गोबर इतना ज्यादा होता है कि गायों के अहाते से उसे ट्रैक्टर के जरिए निकाला जाता है। गोवंश को हरा चारा व पशु आहार भी दिया जाता है। गोशाला में किसी भी गाय व नंदी को बांधा नहीं जाता है। सुबह के समय सभी को खुले में धूप में रखा जाता है। इस दौरान उनकी शेड में बनी चरनी में चारा डाला जाता है और गोबर की सफाई होती है। दोपहर बाद गोवंश को शेड में छोड़ा जाता है।
ऐसे एकत्र किया जाता है मूत्र
गायों के मूत्र से अर्क बनाने के लिए शुद्ध मूत्र की आवश्यकता होती है। गोवंश में आदत होती है कि एक गाय को मूत्र करता देख बाकी गाय भी मूत्र करने लगती हैं। गोशाला के कर्मचारी गायों के पीछे बर्तन लेकर खड़े होते हैं। जो मूत्र नीचे गिर जाता है उसे एकत्र कर जैविक पेस्टीसाइट बनाए जाते हैं। देशी गायों के बच्चे बहुत सुंदर होते हैं। ये हिरनी के बच्चों के समान चंचल होते हैं। इन्हें दिन में गायों की भीड़ से अलग रखा जाता है। मां अपने बच्चे को कुछ ही देर में ढूंढ लेती है।
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देशी गोवंश का ही करें पालन
गोशाला जुड़े स्वामी पवनदास के अनुसार किसानों को देशी गोवंश को पालना चाहिए। यह दूध और प्राकृतिक खेती दोनों के ही लिए लाभदायक होती हैं। देशी गोवंश को किसानों को निराश्रित नहीं छोड़ना चाहिए।
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