ब्लड बैंक का आह्वान, थैलेसीमिया के मरीजों के लिए करें रक्तदान
बिजनौर। जिले में हर साल थैलेसीमिया के 10 मरीजों की संख्या बढ़ रही है। अब जिला अस्पताल के ब्लड बैंक में पंजीकृत मरीजों की संख्या 80 है। यह संख्या 2019 में 60 थी। थैलेसीमिया से ग्रसित मरीज को हर महीने एक यूनिट रक्त की जरूरत पड़ती है। वहीं, हालत गंभीर होने पर कभी-कभी दो यूनिट भी मरीज को लगाई जाती हैं। ब्लड बैंक की ओर से थैलेसीमिया के मरीजों के लिए रक्तदान की अपील की जा रही है।
थैलेसीमिया एक अनुवांशिक बीमारी है, यह बच्चों को माता-पिता से अनुवांशिक तौर पर मिलने वाला रक्त-रोग है। इस बीमारी के होने से शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया नहीं होती है। जिसकी वजह से बच्चे के शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन सही तरीके से नहीं हो पाता है। जिसके चलते थैलेसीमिया से ग्रसित बच्चे को हर महीने एक यूनिट खून चढ़ता है। जिले के 80 बच्चे इस समय थैलेसीमिया से ग्रसित हैं। ब्लड बैंक इन बच्चों को मुफ्त में 80 यूनिट रक्त देता है। इसके साथ ही सीनियर लैब टेक्नीशियन राकेश चौहान ने बताया कि थैलेसीमिया से ग्रसित सबसे ज्यादा बी पॉजिटिव ब्लड ग्रुप वाले बच्चों की संख्या 35 हैं। इसके बाद अन्य ब्लड ग्रुप के 45 बच्चे हैं।
जिले में थैलेसीमिया से ग्रसित इन 80 बच्चों में एक वर्ष से 14 वर्ष तक के हैं। मनुष्य के शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की उम्र लगभग 120 दिन होती है। लेकिन थैलेसीमिया के रोगी में इन कोशिकाओं का जीवन करीब 20 दिन ही रह जाता है। जिस वजह से हर माह खून की जरूरत पड़ती है। डॉ. आरएस वर्मा ने बताया कि इस समय थैलेसीमिया का कोई इलाज नहीं है। इसे हीमोग्लोबिन ऑफ पैथीज भी कहते हैं। जिसकी वजह से हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता है। जब तक मरीज के अंदर हीमोग्लोबिन ठीक रहता है, वह स्वस्थ रहता है, उसके बाद फिर से खून चढ़ाना पड़ता है। इस तरह के मरीजों को हर महीने ब्लड की जरूरत पड़ती है। इसलिए सभी को रक्तदान करना चाहिए।
ये हैं थैलेसीमिया के लक्षण
- मरीज का सूखता चेहरा
- लगातार बीमार रहना
- वजन का न बढ़ना
- शरीर में खून का न बनना
- पैरों पर सूजन बढ़ती चली जाएगी