-प्रशासन ने शासन से मांगी वित्तीय अनुमति
नंबर गेम
03 करोड़ रुपये का बजट विदुरकुटी के लिए मिला
01 करोड़ रुपये कण्व ऋषि आश्रम के लिए प्राप्त हुआ
01 करोड़ रुपये से पारसनाथ के किले का होगा जीर्णोद्धार
बिजनौर। जिले में ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक स्थलों के विकसित करने की दिशा में एक और कदम आगे बढ़ गया है। विदुरकुटी, कण्वऋषि आश्रम और पारसनाथ के किले के लिए शासन ने करीब पांच करोड़ रुपये भेज दिए गए हैं। अब प्रशासन वित्तीय अनुमति का इंतजार कर रहा है। अनुमति मिलते ही काम शुरू करा दिया जाएगा। वहीं इसके बाद जिले में पर्यटन की संभावनाएं भी बढ़ जाएगी।
यूं तो जिले में पौराणिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों की लंबी सूची है। ऐसे में यूं तो सभी को विकसित करने की तैयारी है, लेकिन इनमें तीन स्थलों का चयन पहले सूची में कर लिया गया है। शासन को भेजे गए प्रस्ताव में विदुरकुटी, कण्व ऋषि आश्रम और पारसनाथ के किले को बजट मिल गया है। शासन ने कुल पांच करोड़ का बजट भेजा गया है। इसमें तीन करोड़ रुपये का बजट विदुरकुटी, एक करोड़ का बजट कण्व ऋषि आश्रम रावली, एक करोड़ का बजट बढ़ापुर के पास पारसनाथ के किले पर खर्च किया जाएगा। यहां के जीर्णोद्धार के साथ पर्यटकों की सुविधाओं के लिए भी काम कराए जाएंगे। जैसे वहां की सड़के, घूमने के लिए रास्ते, बैठने की व्यवस्था भी कराई जाएगी।
बजट मिल गया है, अनुमति का इंतजार: सीडीओ
सीडीओ पूर्ण बोहरा ने बताया कि पांच करोड़ रुपये का बजट मिल चुका है। शासन से काम कराने के लिए अनुमति मांगी गई है। शासन से मंजूरी मिलते ही काम शुरू करा दिया जाएगा। इससे विदुरकुटी, कण्व ऋषि आश्रम और पारस नाथ के किले पर पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
- खास है विदुरकुटी
गंगा किनारे स्थित विदुरकुटी महाभारतकालीन इतिहास समेटे हुए हैं। महाभारत के वक्त नीतिकार विदुर हस्तिनापुर छोड़कर दारानगर गंज के पास विदुरकुटी आ गए थे। भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन का छप्पन भोग त्यागकर विदुरकुटी में ही बथुए का साग खाया था। ऐसी मान्यता है कि भगवान कृष्ण जब हस्तिनापुर में कौरवों को समझाने में असफल रहे थे तो वह गंगा पार करके महात्मा विदुर के आश्रम में आए थे। तब से लेकर आज तक सालभर यहां बथुआ हराभरा रहता है। विदुरकुटी में महात्मा विदुर का मंदिर बना हुआ है।
- खास है कण्व ऋषि आश्रम बिजनौर
गंगा और मालन नदी के संगम के पास कण्व ऋषि आश्रम है। इस आश्रम को पर्यटन के नक्शे पर लाने की कवायद चल रही है। यह जगह राजा दुष्यंता और शकुंतला की प्रणय स्थली रही है। इसी आश्रम में इनके पुत्र भरत का लालन पोषण भी हुआ था। यह आश्रम बिजनौर से करीब दस किलोमीटर दूर है।
- पारसनाथ का किला
बढ़ापुर से करीब चार किलोमीटर दूर काशीवाला गांव के पास पारसनाथ किले के अवशेष आज भी आस पास के खेतों में बिखेरे हुए हैं। बताया जाता है कि पारस राजा ने यहां महल बनवाया था। साथ ही जैन मंदिरों का निर्माण कराया गया था। जैन मंदिरों के अवशेष यहां मिलते रहते हैं। प्राचीन काल में यह स्थान जैन धर्म का प्रमुख केंद्र था।