जामा मस्जिद के इमाम मुफ्ती मुजम्मिल हुसैन कासमी ने कहा कि दुनियाभर में एक मई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसकी शुरुआत एक मई 1886 में अमेरिका के शिकागो में हुई थी, तब आंदोलन के जरिये आठ घंटे काम का नियम बनवाया गया था। हिंदुस्तान में इसकी शुरुआत एक मई 1923 को मद्रास (चेन्नई) से हुई। लेकिन इस्लाम में मजदूरों के हुकूक (अधिकार) नबी के ज़माने में 1400 साल पहले ही तय कर दिए गए थे, जो आज भी लागू हैं।
नींदड़ू में जुमे की नमाज से पहले खुतबा करते हुए मुफ्ती मुजम्मिल हुसैन ने नबी के हवाले से बताया कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। कोई भी काम किया जा सकता है, लेकिन इंसान को मेहनत और हलाल तरीके से कमाना चाहिए। तमाम नबियों और पैगंबरों ने मेहनत और मजदूरी की व कबीलों की बकरियां चराईं। पहले नबी हजरत आदम अलैहिस्सलाम खेती करते थे।
हजरत जकरिया अलैहिस्सलाम और हजरत लूत अलैहिस्सलाम ने बढ़ई का काम किया, जबकि हजरत दाऊद अलैहिस्सलाम ने लड़ाई में पहना जाने वाला लोहे का जिरहबख्तर (सुरक्षा कवच) बनाकर रोजी कमाई। सभी ने मेहनत कर हलाल तरीके से कमाया।
हमारे नबी हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहूअलैहीवसल्लम ने मजदूरों के साथ अच्छा सुलूक करने, अपने जैसा खिलाने पिलाने एवं कपड़ा पहनाने, तय हुई मजदूरी में कमी नहीं करने, पर्याप्त मजदूरी देने, पसीना सूखने से पहले उसकी मजदूरी देने, शारीरिक क्षमता और आठ घंटे से ज्यादा कार्य नहीं कराने और किसी भी तरह की सख्ती नहीं करने की ताकीद की थी।
मुसलमानों को चाहिए कि वे अल्लाह के हुक्म और नबी के बताए तरीके पर अमल करते हुए मजदूरों के साथ बेहतर सुलूक करें। अगर कोई कार्य करने से पहले मजदूरी तलब करे, तो उसे काम से पहले मजदूरी भी हालात के हिसाब से दे देनी चाहिए।
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