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पर्यावरण की शुद्धता का द्योतक हैं मधुमक्खी

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पर्यावरण की शुद्धता का द्योतक हैं मधुमक्खी
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कालागढ़ (बिजनौर)। मधुमक्खी पर्यावरण की शुद्धता का द्योतक हैं। कार्बेट टाइगर रिजर्व के वनों में मधुमक्खी के छत्तों से मिला शहद भालू का भोजन बनता है। वहीं, मधुमक्खी स्वयं बी ईटर पक्षी का भोजन है। मधुमक्खियों सबसे अधिक उस क्षेत्र में नजर आती हैं जहां पर्यावरण शुद्ध होता है। वन्यजीवों की तरह कार्बेट पार्क में मधु मक्खियों को नुकसान पहुंचाने पर भी सख्त कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है।
दुनिया में बाघों की दहाड़ व हाथियों की चिंघाड़ के लिए विख्यात कार्बेट टाइगर रिजर्व के वन हर्ब व शर्ब के अनूठे जंगल हैं। यह जंगल जहां रंग बिरंगे पक्षियों, हिंसक, शर्मीले वन्यजीवों व कीट पतंगों से भरे पड़े हैं। इन वनों में तराई के जंगलों में विशेषकर सेंबल के वृक्षों पर मधुमक्ख्यिों के बड़ी संख्या में छत्ते लगे हुए हैं। कालागढ़ रेंज, झिरना, ढेला आदि के वनों में इनके काफ़ी छत्ते नजर आते हैं। किसी किसी पेड़ पर तो अनेेक छत्ते दिखाई देते हैं। इनकी भिनभिनाहट पर कवियों व लेखकों ने अनेक रचनाएं लिखी हैं। आसपास के खेतों में भी इनके छत्ते हैं।
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प्रकृति प्रेमियों संजीव मेहरा, राजेंद्र अग्रवाल, वीरेंद्र कुमार अग्रवाल आदि का कहना है कि पेड़ों पर लगे छत्तों का आकर्षण किसी भी अपनी ओर बांध लेता है। यह प्रकृति की एक खूबसूरती है जो कालागढ़ के वनों में नजर आती है। कालागढ़ के उप प्रभागीय वनाधिकारी कुंदन सिंह खाती ने बताया कि वनों जिस पर प्रकार से बाघ, हाथी व अन्य जीवों के संरक्षण के लिए परियोजनाएं चलाई जा रही हैं उसी प्रकार मधुमक्खी को संरक्षण दिया गया है। वनों में या कार्बेट के आसपास मधुमक्खियों के छत्तों व मक्ख्यिों को नष्ट करने पर कानूनी कार्रवाई की जाती है। वनों में गर्मी के दिनों मे पेड़ों पर व सर्दियों में अक्सर गुफाओं या पत्थरों की आड़ में अपने छत्ते बना लेती हैं। इनके छत्तों का शहद भालू का प्रिय भोजन है। वहीं मक्खी स्वयं बी ईटर चिड़िया का भोजन है।
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कॉर्बेट में पाई जाती है एपिस सिनारा और एपिस मैलीफेरा मधुमक्खी
पूर्व डीएफओ नरेंद्र सिंह का कहना है कि उत्तराखंड के कॉर्बेट पार्क में एपिस सिनारा और एपिस मैलीफेरा मधुमक्खी पाई जाती हैं। एपिस फ्लोरिया भी आसपास स्थित के कृषि क्षेत्रों में पाई जाती हैं। इनका कॉर्बेट के पारितंत्र में विशेष योगदान है। क्योंकि परागण में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। अनगिनत कीट प्रजातियां वर्तमान में विलुप्त हो रही हैं। आने वाले समय में फसलों के परागण बाधित होने से पारिस्थितिकी पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। सामान्य प्रजातियां जैसे कि बफ-टेल्ड भौंरा, यूरोपीय शहद मधुमक्खी और आम छोटी काली मक्खियां, जो तापमान और स्थितियों की एक विशाल श्रृंखला में जीवित रह सकती हैं, हमारे भोजन स्रोतों को प्रदूषित करने वाली मुख्य प्रजातियां बन जाएंगी, जबकि दुर्लभ प्रजातियों की संख्या में गिरावट आएगी। वनों में आग से व सर्दियों में कोहरे से इनके जीवन को नुकसान पहुंचता है। आज इनके संरक्षण की आवश्यकता है। मधुमक्खियों सबसे अधिक उस क्षेत्र में नजर आती हैं जहां पर्यावरण शुद्ध होता है। पर्यावरण संरक्षण के लिए मधुमक्खियों के लिए भी विशेषज्ञों को यहां शोध करने चाहिए।
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