चंदक। पानी खुद खत्म होकर भी पेड़ों की जड़ों को सींचता है, इसलिए वह कभी पेड़ों को अपने में डूबने नहीं देता है। मां-बाप और अध्यापक के जीवन का भी यही सिद्धांत होता है। लेकिन कभी कभी बच्चे अनजाने में माता-पिता या अध्यापकों की डांट से ऐसे काम कर जाते हैं, जिसका पछतावा उन्हें ताउम्र भी करना पड़ सकता है। शिक्षक द्वारा पहाड़े सुनने की आदत और पिता की डांट से डरकर एक महेश कुमार किशोरावस्था में घर से भाग तो गया तो दुनिया के सारे रंग खुलकर सामने आ गए। पछतावा हुआ तो 23 साल बाद घर लौटा और अपने परिवारवालों से मिलकर फूट फूटकर रोया।
गांव बुडगरा निवासी महेश कुमार पुत्र इमरत सिंह साल 1998 में कक्षा छह में पढ़ता था। उसकी उम्र करीब 13 साल थी। स्कूल में अध्यापक ने महेश कुमार से पहाड़े याद कर सुनाने को कहा, लेकिन महेश कुमार पहाड़े याद करने से डर गया और घर से भागने की योजना बनाई। वह मजदूरी के रुपये एकत्र कर जनता एक्सप्रेस से देहरादून भाग गया। महेश कुमार ट्रेन में बैठकर दिल्ली चला गया। दिल्ली पहुंचते पहुुंचते ही उसके सारे रुपये खत्म हो गए। टायर पंक्चर जोड़ने वाले एक दुकानदार ने उसे दो वक्त की रोटी देने के बदले अपने यहां काम पर रख लिया। महेश अपने काम में निपुण हो गया। बाद में महेश की माली हालत फिर खराब हो गई। वह भी राजस्थान गया और किसी तरह दोबारा काम जोड़ा। इस दौरान एक महिला से शादी की। रविवार शाम को वह बीवी-बच्चों के साथ 23 साल बाद गांव पहुंचा तो किसी को यकीन नहीं हुआ। उसका कहना है कि अपने परिवार से बिछड़कर उसने बहुत कुछ खोया है।