बिजनौर में सेंक्चुरी एरिया में कछुओं ने इंसानों द्वारा बनाए गए घोंसलों में आंखें खोलनी शुरू कर दी हैं। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अधिकारी इन बच्चों को एकत्र कर रहे हैं। अब तक 414 बच्चे अंडों से बाहर आ चुके हैं। खेतों में दबे कछुओं के अंडों को बचाने के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने यह कवायद शुरू की थी। अंडों से निकलने के बाद इन कछुओं के बच्चों को शुरुआत में एक तालाब में रखा जाएगा। तालाब में थोड़ा परिपक्व होने के बाद इन बच्चों को गंगा में छोड़ा जाएगा।
जलीय जीव ही नदी का जीवन हैं। गंगा नदी की धारा में कछुओं की 12 प्रजाति पाई जाती है। इनमें से छह प्रजाति खतरे में हैं। कछुए गंगा नदी के तट पर रेत में घोंसला बनाकर अंडे देते हैं। गंगा नदी के बहाव का क्षेत्र हर साल बदल जाता है। जहां गंगा का पानी नहीं होता, वहां पर किसान खेती करने लगते हैं।
इस जमीन की जुताई करने, खेतों में फसल को पानी देने व पेस्टीसाइट का प्रयोग करने से अंडे नष्ट होते हैं। किसान भी अंडों को फेंक देते हैं। ऐसे ही हर साल हजारों अंडे बर्बाद हो जाते हैं और कछुओं संख्या अपेक्षाकृत नहीं बढ़ती है। कछुओं के अंडों को सहेजकर उनकी संख्या बढ़ाने के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (वर्ल्ड वाइल्ड फंड) ने अभियान चलाया था। अभियान के अंतर्गत गंगा किनारे हैचरी (प्रजनन केंद्र) बनाई गई थी। जहां भी किसान के खेत में अंडे निकले, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अधिकारी व कर्मचारी खेत पर जाकर किसान से अंडे लेते। इन अंडों को हैचरी में मानव निर्मित घोंसलों में रखा गया था। अब इन अंडों से बच्चे बाहर निकलने लगे हैं। इन बच्चों को अंडों से बाहर आने के बाद एक तालाब में रखा जा रहा है। बाढ़ का समय निकलने के बाद इन बच्चों को गंगा की धारा में छोड़ दिया जाएगा।
तापमान, नमी का रखते हैं ध्यान
कछुए नवंबर से अप्रैल तक अंडे देते हैं। घोंसला बनाकर अंडा देते समय वे तापमान, नमी का ध्यान रखते हैं। कछुए घोंसले में अंडे की लेयर बनाते हैं। सबसे ऊपर की लेयर से बच्चे सबसे पहले निकलते हैं। इंसानी घोंसलों में अंडों से कछुए के बच्चा पैदा होने से डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अधिकारी भी गदगद हैं।
अंडे से निकलकर सीधे नदी की ओर भागते हैं बच्चे
कछुआ अंडे देने के बाद घोंसले के बाद फिर नहीं आता है। फिर भी उसके बच्चे अंडे से निकलकर सीधे नदी की ओर ही भागते हैं। वाइल्ड लाइफ के अधिकारी अभी भी इस पर शोध कर रहे हैं कि ऐसा कैसे होता है।
कर रहे पूरे प्रयास : संजीव यादव
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजना अधिकारी संजीव यादव के मुताबिक कछुओं की संख्या बढ़ाने के लिए गंगा किनारे हैचरी बनाई थी, जिससे अब बच्चे बाहर निकलने लगे हैं। उचित देखभाल से कछुओं की संख्या बढ़ेगी। कछुओं की संख्या बढ़ाने के लिए पूरे प्रयास किए जा रहे हैं।