साल भर में दर्ज हुए एससी/एसटी एक्ट के 82 मामले
बिजनौर। जिले में एससी/एसटी एक्ट के मामले पहले से दर्ज होते आए हैं। इन मामलों में जांच के बाद एक साल के अंदर 74 मामले दर्ज हुए हैं। इनमें पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार करके चार्जशीट दाखिल की है। आठ मामले जांच के दौरान झूठे पाए गए। नए संशोधित एक्ट पर कानूनविदों की अलग-अलग राय है। वरिष्ठ अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ही उचित ठहरा रहे हैं।
सरकार के एससी/एसटी एक्ट के मामले में नए संशोधन के बाद जिले के दो अफसर एससी/एसटी एक्ट के मामले में घिरते नजर आ रहे हैं। चांदपुर के आईएएस एसडीएम आलोक यादव के खिलाफ उनके आशु लिपिक किशन चंद ने जातिसूचक शब्दों से अपमानित करने का आरोप लगाकर एससी/एसटी आयोग समेत आला अफसरों को शिकायत की। वहीं धामपुर में तैनात बीएसएनएल के उपमंडलीय अभियंता जयप्रकाश सिंह पर टेलीकॉम टेक्नीशियन अजयपाल ने जातिसूचक शब्दों से अपमानित करने का आरोप लगाया है। दो अफसरों के घिरने के बाद बाकी अफसर दलित कर्मचारियों से चौकस हो गए हैं और उनसे दूरी बनाने लगे हैं। ऐसा कोई मौका नहीं दे रहे कि उन पर भी कोई आरोप लगे। जिन कर्मचारियों से छोटा-मोटा विवाद है उनसे साफ सुलह की कवायद शुरू हो गई है। अफसर इन मामलों को लेकर काफी टेंशन में हैं। सामान्य, पिछड़े व अल्पसंख्यक वर्ग के संगठन नए संशोधन का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसे कानूनों के लागू होने से देश में सभी के एक समान होने का अधिकार कैसे मिल सकता है। वहीं दलित संगठन नए संशोधन की पैरवी कर रहे हैं। हालांकि अभी किसी दलित संगठन ने एससी/एसटी एक्ट में आरोपित किए गए दोनों अधिकारियों की गिरफ्तारी की मांग नहीं की है। विश्व दलित परिषद ने तो चांदपुर के एसडीएम प्रकरण में खुद जांच कमेटी गठित कर दी है। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक जिले में एक साल के भीतर एससी/एसटी एक्ट के 82 मामले दर्ज हुए हैं। इनमें आठ मामले झूठे पाए गए, बाकी 74 मामलों में आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है।
सत्यता के आधार पर हो कार्रवाई
वरिष्ठ अधिवक्ता फौजदारी अनिल चौधरी का कहना है कि अपराध तो अपराध है। उसमेें किसी जाति विशेष के लिए कानूनी प्रक्रिया में फर्क नहीं होना चाहिए। सामान्य जाति के लोगों के लिए अलग और एससी वर्ग के लिए अलग-अलग कानूनी प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए, ऐसा करना गलत है। उन्होंने कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय उचित था कि सिर्फ आरोप के आधार पर गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। जांच के बाद सत्यता के आधार पर ही गिरफ्तारी हो।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू हो फिर से
जिला बार अध्यक्ष एसके बबली का कहना है कि सही मामला न हो तो गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा था कि मामले की जांच के बाद सत्यता के आधार पर गिरफ्तारी होनी चाहिए, वही सही है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश ही फिर से लागू होना चाहिए।
किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं
महादेवपुरम निवासी कैलाश त्यागी के अनुसार एससी/एसटी एक्ट में संशोधन गलत है। इसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। किसी भी देश में ऐसा कानून नहीं है जहां सिर्फ आरोप के आधार पर किसी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाए। कहा कि एससी/एसटी एक्ट में जांच से पहले गिरफ्तारी का विरोध जारी रहेगा।
सरकार का निर्णय सर्वोपरि
भाजपा जिलाध्यक्ष राजीव सिसौदिया का कहना है कि इस मामले में सभी पक्षों को ध्यान में रखा जा रहा है। सरकार जो भी निर्णय लेगी वह सभी के हित में होगा। वहीं कांग्रेस जिलाध्यक्ष बाबू डूंगर सिंह का कहना है कि कोई भी निर्दोष जेल नहीं जाना चाहिए। ऐसे मामलों की जांच एक दो दिन में ही कराकर आगे की कार्रवाई हो। किसी भी कानून का दुरुपयोग न हो।
प्रदर्शन करना अवैधानिक
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जन जागृति महासंघ जिलाध्यक्ष चंद्रहास सिंह के अनुसार एससी/एसटी एक्ट को संसद के दोनों सदनों ने पास किया है व राज्यपाल ने कानून का रूप दिया है। इस एक्ट के खिलाफ प्रदर्शन अवैधानिक है। कहा कि भारतीय समाज मिलकर रहने वाला है। एससी/एसटी के हर जगह बहुत कम मामले आते हैं।