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अब शादी-ब्याह में होगी ईको फ्रेंडली दावत

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अब शादी-ब्याह में होगी ईको फ्रेंडली दावत
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बिजनौर। अब शादी-ब्याह व अन्य कार्यक्रमों में ईको फ्रेंडली दावत होगी। मिट्टी के बर्तनों का दौर फिर से लौट आया है। मिट्टी के ये बर्तन स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए लाभदायक है। प्लास्टिक और थर्माकोल के प्रयोग पर रोक के बाद अब मिट्टी के बर्तन प्रयोग में लाए जा रहे हैं। इनकी मांग बढ़ रही है। मिट्टी के बर्तन प्रयोग होने के बाद मिट्टी में ही मिल जाएंगे। इनके प्रयोग से किसी तरह की हानि पर्यावरण या स्वास्थ्य को नहीं होगी।
अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए हवा और पानी साफ रखनी है तो पर्यावरण को सुरक्षित रखना होगा। कितने ही पेड़ पौधे लगा लिए जाएं या फिर पानी बचाएं जब तक प्लास्टिक/पॉलीथिन का प्रयोग बंद नहीं करेंगे पर्यावरण सुरक्षित नहीं रहेगा। प्लास्टिक मिट्टी, पानी में जाकर और जलने के बाद इससे निकलने वाली गैस पर्यावरण में जाकर पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य को नुकसान दे रही हैं। अब तक शादी व अन्य कार्यक्रमों में प्लास्टिक के बने बर्तनों का ही प्रयोग किया जाता था। प्रयोग के बाद या तो इन बर्तनों को कुछ समय बाद जला दिया जाता था या फिर ये मिट्टी में दबते थे। दोनों ही सूरत में पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को नुकसान होता था। प्लास्टिक व थर्माकोल का अंधाधुंध प्रयोग बढ़ता ही जा रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने प्लास्टिक व थर्माकोल के प्रयोग पर रोक लगा दी है। प्लास्टिक व थर्माकोल के बर्तनों पर रोक लगने के बाद अब मिट्टी के बर्तनों के प्रयोग पर जोर दिया जा रहा है। मिट्टी के बर्तना शादी ब्याह तक में प्रयोग हो रहे हैं। एक तरह से कहा जाए तो इन बर्तनों का फैशन भी चल रहा है।
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थर्माकोल व प्लास्टिक के नुकसान
आम तौर पर लोग प्लास्टिक/पॉलिथीन को जला देते हैं। प्लास्टिक को जलाने से स्टाइरिन गैस निकलती है। गर्भवती महिलाओं की त्वचा इस गैस को सोख लेती है। सांस के जरिये यह गैस गर्भ में पल रहे बच्चे के अंदर चली जाती है और बच्चे के दिमाग व स्वास्थ्य पर बुरा असर डालती है। यह गैस कैंसर का भी कारण बन जाती है। प्लास्टिक जमीन में गलने में 100 से 300 साल तक का समय लेती है। इससे जमीन की उर्वरक क्षमता घटती है। जिस जमीन में प्लास्टिक अधिक संख्या में चली जाती है उस जमीन की पानी सोखने की क्षमता बहुत कम हो जाती है। उस जमीन पर खेती नहीं की जा सकती है। नदियों में पॉलिथीन में खाद्य बांधकर डाल देते हैं। जलीय जीव खाद्य पदार्थों के साथ साथ पॉलिथीन को भी खा जाते हैं। इससे उनकी मौत भी हो जाती है। इससे नदी का जीवन चक्र बिगड़ जाता है। प्लास्टिक के गिलास व प्लेट आदि में गर्म खाना रखने से हानिकारक तत्व पैदा होते हैं। इनसे कैंसर तक हो जाता है। रिसाइकिल किया हुआ घटिया गुणवत्ता वाला गिलास तो उपभोक्ताओं ने काफी पहले प्रयोग करना बंद कर दिया था, लेकिन प्लास्टिक से बने हर तरह के गिलास, कटोरी, प्लेट से यह खतरा बना रहता है।

ऐसे बनते हैं मिट्टी के बर्तन
मिट्टी के बर्तन भट्टी में बनाए जाते हैं। इनको 500 से 600 डिग्री तापमान पर पकाया जाता है। जब तक मिट्टी बहुत ठोस बन जाती है। मिट्टी ऐसी अवस्था में पहुंच जाती है कि यह टूटती नहीं है। मिट्टी के कण खाने में नहीं जाते हैं। प्लास्टिक व थर्माकोल के गिलास के मुकाबले मिट्टी के बर्तन, प्लेट लगभग एक समान कीमत के ही हैं। प्लास्टिक व थर्माकोल का एक गिलास 70 पैसे की दर से मिलता है। जबकि मिट्टी का गिलास एक रुपये में मिलता है। थर्माकोल व प्लास्टिक की कटोरी डेढ़ रुपये तक की मिलती है, जबकि मिट्टी की छोटी कटोरी दो रुपये व बड़ी कटोरी ढाई रुपये में मिलती है।
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नवंबर में होने वाली दो शादियों से मिले ऑर्डर
मिट्टी के बर्तन के विक्रेता योगेंद्रपाल योगी व केशव कुमार के अनुसार मिट्टी के बर्तनों की काफी डिमांड आ रही है। इनमें खाना खाने से स्वास्थ्य व पर्यावरण दोनों को नुकसान नहीं होगा। केशव कुमार के अनुसार उन्होंने किरतपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में मिट्टी के बर्तन दिए थे। वहां से अच्छा रेस्पांस आया है। इसके अलावा धामपुर, किरतपुर के कुछ रेस्टोरेंट में भी मिट्टी के बर्तन में रसगुल्ले, चाय, कॉफी आदि सर्व की जा रही हैं। पिछले डेढ़ महीने में उन्होंने उत्पादन काफी बढ़ाया है। कई हलवाई उनसे मिट्टी के बर्तन खरीदने के लिए संपर्क कर रहे हैं। चार जन्मदिन पार्टी के ऑर्डर मिले थे, जिन्हें वह पूरा कर चुका है। इसमें उसने एक-एक हजार गिलास भेजे थे। धामपुर क्षेत्र से नवंबर में होने वाली दो शादियों के ऑर्डर मिले हैं। इनमें उसे दो-दो हजार गिलासों का ऑर्डर मिला है।
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