एशियन गेम्स के पहले मैच में नेपाल के खिलाफ यशस्वी जायसवाल ने 49 गेंदों में 100 रन की पारी खेली। उन्होंने 8 चौकों और सात गगनचुंबी छक्के लगाए। यशस्वी की ये पारी इसलिए खास है क्योंकि जिस विकेट पर उन्होंने शतक जड़ा, वो बल्लेबाजी के लिए आसान नहीं था। दूसरे छोर से विकेट गिर रहे थे लेकिन एक छोर पर यशस्वी न सिर्फ डटे रहे बल्कि ताबड़तोड़ बैटिंग जारी रखी।
इसी का नतीजा रहा कि उन्होंने 48 गेंद में ही शतक पूरा कर लिया। इसके साथ ही यशस्वी जायसवाल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि क्यों उन्हें भारतीय क्रिकेट का नया सितारा माना जा रहा है। टेस्ट क्रिकेट में धमाकेदार डेब्यू के बाद से ही यशस्वी जायसवाल टी-20 इंटरनेशनल में भी अपने बल्ले से कोहराम मचा रहे हैं।
अपनी हस्तनिर्मित खूबसूरत कालीन के लिए दुनियाभर में मशहूर भदोही की लोकप्रियता में उसके अपनी मेहनत और शानदार क्रिकेट से यशस्वी जायसवाल लगातार इजाफा कर रहे हैं। सुरियावां नगर के छोटे व्यवसायी भूपेंद्र जायसवाल और मां कंचन के परिवार में जन्म लेने वाले दो पुत्रों में शामिल यशस्वी बचपन से क्रिकेटर बनना चाहते थे।
क्रिकेट का जुनून इस कदर हावी था कि मात्र 11 साल की उम्र में ही जायसवाल मुंबई चले गए थे। वहां उन्होंने मुफलिसी में दिन गुजारे लेकिन अपने इरादे से डगमग नहीं हुए। वर्ष 2012 में उन्होंने मुंबई आजाद मैदान में मुस्लिम यूनाइटेड क्लब की शतक मारने की शर्त जीतकर उन्होंने क्रिकेट की पहली सीढ़ी चढ़ी तो पीछे पलटकर नहीं देखा।