रोजगार की शत प्रतिशत गारंटी देने वाली केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी मनरेगा योजना भी मेहनतकशों का भला नहीं कर सकी। वित्तीय वर्ष 2015-16 में जिले के एक लाख 22 हजार मनरेगा जाबकार्डधारकों में सिर्फ 443 कार्डधारकों को 100 दिन काम की गारंटी मिल सकी। वहीं 30 हजार कार्डधारकों को 50 से 60 दिन ही काम नसीब हुआ। जिससे 75 फीसदी मजदूर एक साल तक काम का इंतजार करते रह गए।
मजदूर दिवस के नाम पर भले ही हो-हल्ला कर लिया जाए और हालात को कोस लिया जाए, लेकिन हकीकत में मजदूरों की दुर्गति के पीछे जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली ही जिम्मेदार है। केंद्र सरकार की बेहद महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा भी मजदूरों का भला नहीं कर पाई। मनरेगा मजदूरों को समुचित काम तो मिल नहीं पा रहा है, अलबत्ता उनका शोषण जरूर हो रहा है।
2007-08 में लागू हुई केंद्र की महत्वाकांक्षी महत्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना जिले में एक साल बाद लागू हुई लेकिन मजदूरों की स्थिति में सुधार नहीं हो सका। 2015-16 में जिले के छह ब्लॉकों के 481 ग्रामसभाओं में एक लाख 22 हजार मजदूरों के जाबकार्ड बनाए गए लेकिन साल के 365 दिनों में 30 हजार को ही काम मिल सका। इस मामले में सबसे खास बात यह है कि 100 दिन काम देने की गारंटी वाली योजना में मात्र 443 कार्डधारकों को 100 दिन काम मिल सका। इससे प्रशासनिक व्यवस्था पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। मुख्य विकास अधिकारी आरपी मिश्र ने कहा कि ग्रामसभाओं में काम के हिसाब से मजदूरों को काम दिया जाता है।