सिद्धार्थनगर। नगर निगम में रोहिंग्या-बांग्लादेशी युवक के सफाईकर्मी के रूप में भर्ती होने के खुलासे के बाद पूरा सिस्टम सतर्क हो गया है। नौ नगर पंचायत और दो नगर पालिका में तैनात सफाई कर्मियों की कुंडली खंगाली जा रही है। उनका कागजी सत्यापन शुरू हाे गया है। उनके निवासी से लेकर शैक्षिक योग्यता की जानकारी ली जा रही है।
निकाय से जुड़े लोगों की माने तो अबतक की रिपोर्ट में 70 प्रतिशत स्थानीय और करीब 30 प्रति पड़ोसी जिलों के सफाई कर्मी मिले हैं। सत्यापन पूरा होने के बाद असल तस्वीर सामने आएगी किसी के प्रमाण पत्र में कोई गड़बड़ी है या नहीं है।
सीमावर्ती जनपद होने के कारण यहां नेपाल बॉर्डर का इलाका सबसे संवेदनशील माना जाता है। बॉर्डर से सटे बाजारों में ढुलाई, फेरी और अस्थायी व्यवसाय करने वाले बड़ी संख्या में बाहरी लोगों के आने-जाने की बात सामने आती है। इसमें बांग्लादेशी-रोहिंग्या होने से इन्कार नहीं किया जा सकता है। स्थानीय प्रशासन का मानना है कि इसी ढील का फायदा उठाकर बाहरी संदिग्ध लोग नगर निकायों में काम पकड़ लेते हैं।
अगर वर्षों से जमा रिकॉर्ड को खंगाला जाए तो संदिग्धों के तार सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुंच सकते हैं। जिले की 68 किलोमीटर सीमा नेपाल से लगती है जो सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील बना हुआ है।
जनपद की सात नगर पंचायतों और दो नगर पालिकाओं में कुल मिलाकर ढाई सौ से अधिक सफाई कर्मी कार्यरत हैं, जिनमें महिलाओं की संख्या अधिक है। सभी का सत्यापन युद्धस्तर पर चल रहा है। आधार, निवास, पारिवारिक विवरण, पिछले कार्यस्थल और मोबाइल नंबर तक खंगाले जा रहे हैं।
बॉर्डर एरिया में संदिग्धों की पहचान कैसे हो: सुरक्षा से जुड़े एजेंसी के लोगों की माने तो जांच इस प्रकार से जरूरी है। फेरी वालों के लिए अनिवार्य हो दैनिक, साप्ताहिक पंजीकरण, अस्थायी व्यवसाय करने वालों को चिह्नित कर डिजिटल रिकॉर्ड बनाया जाए। नगर निकायों में भर्ती से पहले पुलिस और खुफिया यूनिट की संयुक्त जांच, सीमावर्ती बाजारों में सीसी टीवी से ट्रैकिंग जांच, मोबाइल नंबर व नए किरायेदारों की थाने में इंट्री अनिवार्य किया जाए, जिससे उनकी पहचान आसानी से हो सकेगी।
दिखने और व्यवहार में फर्क : कई सफाई कर्मी लंबे समय से काम करते दिखते हैं, लेकिन स्थानीय बोली, गांव-क्षेत्र की जानकारी नहीं रखते। पहनावे, बोलचाल और शारीरिक बनावट से कई लोग आसपास के जिलों या भारत-नेपाल सीमा के बाहर के प्रतीत होते हैं। नगर पंचायतों में दर्ज नाम और जमीनी तौर पर मौजूद व्यक्ति में कई बार असंगति मिली है, यही सबसे बड़ा संदेह। कुछ कर्मचारी पहचान पत्र दिखाते हैं लेकिन सत्यापन में जन्मतिथि, पते और पिता के नाम में अंतर मिला है।
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