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डीजे के शोर में दबी फगुआ की मिठास

Wed, 23 Mar 2016 03:53 PM IST
राम ललित यादव/अमर उजाला ब्यूरो
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अमर उजाला दफ्तर होली - फोटो : अमर उजाला
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बस्ती। ‘होली खेलें रघुबीरा..., ब्रिज है कोई पपिहा उड़ावै रे आली, पिया-पिया शब्द सुनावै..., आज ब्रिज में होली रे...’ गाती हुरियारों की टोली गांव से गायब हो गई है। पुराने हुरियारों को गांव के फागुन में आया बदलाव साल रहा है। रंगों से सराबोर कर देने वाली होली में मिठास घोलने वाली जोगीरा... की बोली खामोश है। फगुआ का राग, ढोलक की थाप और झांझों की झंकार बिना पुरानी पीढ़ी त्योहार का वह रस नहीं पा रही जिसकी वह आदी थी। पहले महाशिवरात्रि से ही हुरियारों का राग सुनाई पड़ने लगता था। फागुन तेरस को क्षेत्र में लगने वाले विशाल मेले से फगुआ गायन शुरू हो जाता था। लेकिन अब डीजे के शोर में परंपरा की मिठास कहीं गुम हो गई सी लगती है।
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केसरई गांव के बुजुर्ग रामसमुझ चौधरी, बभनान के फरेनियां गांव के संतराम विश्वकर्मा बताते हैं कि अब साथियों के न होने से गांव में फाग का महत्व खत्म होता जा रहा है। युवा पीढ़ी इसे एकदम भूलती जा रही है। इस परंपरा का निर्वाह युवा पीढ़ी नहीं कर पा रही है। इन लोगों ने बताया कि महाशिवरात्रि के बाद गांव में फगुआ गायकों की मंडली सक्रिय हो जाती थी। घर-घर घूमकर लोग होली के दिन तक फाग गीत गाते थे। इसके बाद भी 15 दिन तक चैता गाकर आनंद उठाते थे। अब यह परंपरा गांव से लगभग लुप्त होती जा रही है। क्योंकि पुराने फगुआ गायक अब नहीं रहे। जो हैं भी वे वृद्ध हो चुके हैं और नई पीढ़ी में अलग-थलग पड़ गए हैं। ये नई पीढ़ी पुरानी परंपरा को छोड़ नई ओर भाग रहे हैं। वे फिल्मी और भोजपुरी गीतों को ओर आकर्षित है। फगुआ जैसे प्रसिद्ध लोक गायन की ओर उनका ध्यान नही है। इसके चलते सदियों पुरानी यह परंपरा खत्म होती जा रही है। केसरई के पीएम तिवारी और सकदरपुर के जोखू प्रसाद मिश्रा फगुआ के मशहूर गायक माने जाते थे। अपने गांव के अलावा अगल-बगल के गांव में जाकर गाते थे। शारीरिक रूप से कमजोर हो चुके इन लोगों का कहना है कि आज के लोग फगुआ की तरफ आकर्षित नहीं हैं। उसका कारण गांव में गोलबंदी के साथ-साथ फिल्मी, भोजपुरी गानों का प्रभाव है। एक-दूसरे के साथ बैठना पसंद नहीं कर रहे हैं। इसलिए यह परंपरा समाप्त होती जा रही है। यह पूछे जाने पर कि अपने समय में कैसे फगुआ गाये जाते थे तो बताया कि हम लोग तुलसी, छोटकुन, जगन्नाथ, रंगपाल के लिखे फगुआ गाते थे। जो भक्तिपूर्ण होने के साथ आनंददायक भी होते थे। लेकिन अब डीजे का कानफोड़ू शोर फगुआ पर हावी हो गया है। 
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