फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सियासी समर जीतने खातिर मोहरों पर दांव

विज्ञापन
ईवीएम-वीवीपैट (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
विज्ञापन
बस्ती। निर्वाचन आयोग डाल-डाल तो प्रत्याशी पात-पात की नीति अपनाए हुए हैं। चाहे बात चुनाव खर्च पर अंकुश की हो या वाहन पास। मतदान-मतगणना एजेंटों की नियुक्ति जैसे विभिन्न मदों में तय व्यय अथवा संख्या में गोलमाल करके निर्वाचन आयोग को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। 
विज्ञापन

चुनाव आयोग ने राजनैतिक दलों की नीयत भांपते हुए अलग से पर्यवेक्षक, फ्लाइंग स्कॉट और अन्य निगरानी दल तैनात कर रखा है। लेकिन उसके सीमित विकल्प और उल्लंघन करने वालों के पास गुमराह करने या आंख में धूल झोंकने के कई अवसर उपलब्ध होने से प्रत्याशी चकमा देते रहे हैं। जबकि जिला निर्वाचन अधिकारी डॉ. राजशेखर का कहना है कि इस बार माइक्रो ऑब्जर्वर की निगरानी से कोई बहानेबाजी नहीं चलेगी। जानकारों का कहना है कि नियम-प्रावधानों का पालन करते हुए निकाले गए जुगाड़ की काट शायद उनके वश की बात भी नहीं है। हालांकि, इस बार अभी किसी भी उम्मीदवार का नामांकन नहीं हो सका है, इसलिए किसी प्रत्याशी विशेष के खर्च की गणना का मीटर अभी चालू नहीं हुआ है, लेकिन कटिया कनेक्शन करने वालों जैसी मीटर बाईपास करने का जुगाड़ अभी से तैयार किया जा रहा है।  प्रत्याशियों के खर्चों पर नजर रखने के लिए चुनाव आयोग अलग से व्यय पर्यवेक्षक नियुक्त करता है। आयोग की आंखें बहुत हद तक वही देख पाती हैं, जो प्रत्याशी दिखाता है। एक प्रत्याशी बताते हैं कि चुनाव आयोग की तय सीमा का आंकड़ा हम पहले से तैयार कर लेते हैं। इसमें गाड़ियों, जनसभाओं और प्रचार-सामग्री का गुणा-गणित शामिल किया जाता है। क्षेत्र में वाहनों की अनुमति अगर पांच-पांच की है तो 20-25 वाहनों का काफिला देखा जाता रहा। 
मजबूरी के नाम पर छूट 
चुनाव में एक-एक चीज का तय रेट से हिसाब देना आसान नहीं है। प्रचार के लिए वाहन का पास जारी करने की सीमा है। ऐसे में तमाम ऐसे भी प्रत्याशी खड़े किए जा रहे हैं, जिनका कोई न तो सियासी आधार है, न जन समर्थन। कई तो ऐसे हैं जिनके लिए रोजमर्रा के खर्च का प्रबंध करना मुश्किल है। तो त्रिकोणीय मुकाबले में प्रमुख दलों के उम्मीदवार अभी से दांव लगाए हैं। ऐसा करने से उन्हें बूथ पर अपने ज्यादा एजेंट खड़ा करने की सहूलियत मिल जाएगी। वहीं, प्रचार और अन्य प्रयोजन के लिए वाहन एवं खर्च खपाने का विकल्प मिल जाएगा। 
विज्ञापन


निराधार को तवज्जो नहीं फिर भी ग्लैमर कायम
निर्दलियों और कम लोकप्रिय दलों को बस्ती के मतदाताओं ने ज्यादा तवज्जो कभी नहीं दी। बावजूद इसके इनकी तादाद घटने के बजाए बढ़ती जा रही है। 2014 में कुल 13 और 2009 में 12 निर्दल उम्मीदवार थे। मगर दोनों चुनावों में इनमें से किसी की जमानत नहीं बची थी। अभी दो दिन में ही 50 प्रतिशत से अधिक निर्दली और गुमनाम जैसे नाम वाले दलों के प्रत्याशी पर्चा खरीद चुके हैं। माना जा रहा है कि इनमें कई किसी न किसी के प्रायोजित हैं। 
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें