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मोहर्रम का चांद दिखा, घरों में गूंजी या हुसैन की सदाएं

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बस्ती। इस्लामी साल के पहले महीने मेाहर्रम का चांद फलक पर दिखने के साथ ही मजलिसों का दौर शुरू हो गया। इमामबाड़ों और इमाम हुसैन को मानने वालों के घरों में या हुसैन की सदाएं सुनाई देने लगी हैं।
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मौलाना अली हसन ने कहा कि इमाम हुसैन इस्लाम धर्म के आखिरी पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे थे। उन्हें कर्बला के मैदान में तीन दिन तक भूखा प्यासा रखने के बाद शहीद कर दिया गया था। पैगंबर के मानने वाले इस शहादत की याद हर साल मनाते हैं।
इस सिलसिले में इमामबाड़ा शाबान मंजिल में एक मजलिस का आयोजन किया गया। मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना अली हसन ने कहा कि अरब का शासक यजीद मानवता का दुश्मन था। वह अपने बुरे कामों को शरीयत का रंग देना चाहता था। इसलिए वह इमाम हुसैन से बैय्यत अर्थात समर्पण चाहता था। इमाम जानते थे कि यजीद की बैय्यत के बाद इस्लाम मिट जाएगा और उनके नाना की मेहनत बेकार हो जाएगी। उन्होंने कर्बला के मैदान में अपने बहत्तर साथियों के साथ जिनमें छह माह के हजरत अली असगर भी शामिल थे शहादत पेश की। उन्होंने कहा कि इस्लाम का असल चेहरा कर्बला के शहीदों में ही नजर आएगा।
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मोहम्मद रफीक, सुहेल आदि ने कलाम पेश किया। इस मौके पर फरहत हुसैन, जीशान रिजवी, इरफान अली, तकी, शीबू, शम्स आबिद, अन्नू, नजफी आदि मौजूद रहे।
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