रुहेलखंड नेचर क्लब के अध्यक्ष काजलदास गुप्ता ने बताया कि बढ़ते शहरीकरण के कारण गौरैया अब आंगन में नहीं दिखती। पहले घर-घर अनाज धोया और सुखाया जाता था। यह छोटी और प्यारी से चिड़िया अनाज चुंगने घर आती थी। हमारे बीच रहती थी। अब सब कुछ पैकेट बंद है। गौरैया को घरों की छतों पर अनाज और पानी नहीं मिल रहा। पिछले कुछ वर्षों में गौरैया की संख्या कम हुई है। गौरैया के संरक्षण की जरूरत है।
प्रदूषण के कारण गौरैया पर संकट
जंतु वैज्ञानिक रेनू जोशी ने बताया कि पेड़ों के कटान और पानी की कमी के साथ प्रदूषण के कारण गौरैया पर संकट है। गौरैया के लिए उपयुक्त स्थान और माहौल न होने के कारण इनकी संख्या घट रही है।
डीएफओ समीर कुमार ने बताया कि गौरैया की संख्या पिछले कुछ वर्षों में कम हुई है। इस पक्षी की गणना नहीं की जाती। अलग-अलग वन रेंज से मिलने वाले गौरैया के झुंडों को देखते हुए अनुमान लगाया जाता है। गौरैया संरक्षण को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।