डेढ़ वर्ष में तीन मामले
जिले में डेढ़ वर्ष में इस तरह के तीन मामले सामने आ चुके हैं। जून 2023 में राजेंद्रनगर स्थित निजी अस्पताल में हार्लेक्विन बेबी का जन्म हुआ था। सितंबर 2023 में बहेड़ी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) पर इसी तरह का बच्चा जन्मा था।
बीमारी का कारगर इलाज नहीं
डॉक्टरों के मुताबिक यह विकार माता-पिता से नवजात को ऑटोसोमल रिसेसिव पैटर्न से मिलता है, जो जीन के उत्परिवर्तन से होता है। शरीर में प्रोटीन और म्यूकस मेंब्रेन की गैर-मौजूदगी की वजह से बच्चे की ऐसी हालत हो जाती है।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. कर्मेंद्र ने बताया कि इस बीमारी में बच्चे के शरीर में तेल बनाने वाली ग्रंथियां न होने से त्वचा फटने लगती है। इस तरह के बहुत कम मामले ही सामने आते हैं। अक्सर जन्म के दौरान या कुछ घंटों बाद ही बच्चे की मौत हो जाती है। जो बच जाते हैं, उनके भी ज्यादा दिन तक जीवित रहने की संभावना बेहद कम होती है, क्योंकि इसका कोई कारगर इलाज नहीं है।