जन्मांध घोड़े से 20 सालों से ढोया जा रहा था सामान, जीवाश्रय संस्था ने कराया मुक्त
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घोड़े के शरीर पर चाबुक की मार के गहरे जख्म, तांगा चालक बोला- उसे नहीं थी अंधे होने की जानकारी
बरेली। जानवरों के साथ बेरहमी के मामले आए दिन सामने आ रहे हैं, लेकिन ‘सूरदास’ की कहानी ने लोगों को संवेदनाओं को झकझोर दिया है। जन्माष्टमी पर जन्मांध घोड़े सूरदास को बेरहम तांगा चालक से आजाद कराने के बाद सोमवार को जब लखनऊ जाने के लिए बरेली से उसकी ‘पालकी’ गुजरी तो उसे देखने के लिए पशु प्रेमियों का तांता लग गया। लोगों ने जीवाश्रय गोदोली गोशाला संस्था के प्रयास को सराहा और लखनऊ तक सफर तय करने में सहयोग किया।
संस्था के प्रबंधक अमित सहगल ने बताया कि रुड़की की मंडी में करीब 20 सालों से जन्मांध घोड़े से सामान ढोया जा रहा था। वहां की एक शिक्षिका आरती शर्मा ने एक दिन घोड़े के शरीर पर गहरे जख्म देखे तो वह विचलित हो गईं। उन्होंने लखनऊ की जीवाश्रय गोदोली गोशाला संस्था से संपर्क किया। इस पर संस्था के सदस्य शुभम प्रताप सिंह रुड़की पहुंचे और सात दिन तक गुपचुप घोड़े के संबंध में जानकारियां जुटाते रहे। पता चला कि घोड़ा जन्मांध है। उससे 20 सालों से सामान ढोया जा रहा है। शुभम ने घोड़े को आजाद कराने की बात कही तो अमित संस्था के सदस्य आशीष, शशि शेखर और आसिफ को लेकर रुड़की पहुंच गए। आरती के साथ तांगा चालक से संपर्क किया और घोड़े की जन्मांधता की जानकारी दी। यह सुनते ही तांगा चालक की आंखें भर आईं। कहा, उसे कभी इसका भान ही नहीं हुआ। टीम ने उसे पांच हजार रुपये देकर घोड़ा ले लिया। टीम ने घोड़े को सूरदास नाम दिया और लखनऊ के लिए लेकर चल पड़ी।
टीम से मिलने पहुंचे बरेली के पशु प्रेमी
संस्था के फेसबुक पेज से जुड़े बरेली के पशु प्रेमियों ने अमित से संपर्क किया। पता चला कि वह रुड़की से लखनऊ के लिए रवाना हो चुके हैं। बरेली नैनीताल रोड से सेटेलाइट पहुंचने के दौरान नकटिया के रहने वाली एनिमल क्राइम कंट्रोल संगठन की पूजा सैनी और अनूप उनसे मिलने पहुंचे। रास्ते में बातचीत के दौरान वहां भीड़ जमा हो गई। जिसने भी सूरदास के बारे में सुना, उसकी आंखें भर आईं।