निर्माण कार्य के दौरान मानकों की अनदेखी
वायु प्रदूषण से निजात के लिए एनजीटी ने निर्माण कार्य के दौरान पानी का छिड़काव करने, खोदाई/ध्वस्तीकरण के दौरान धूल के फैलाव को रोकने के लिए हरी चादर लगाने, सड़कों की नियमित सफाई और धूल उठने पर पानी का छिड़काव करने के निर्देश दिए हैं। कार्यदायी संस्थाओं को नियमों से कोई सरोकार नहीं। कुतुबखाना पुल, सिविल लाइंस में सीवर लाइन बिछाने, बदायूं रोड, पीलीभीत बाइपास पर चल रहे निर्माण के दौरान एक-दो बार पानी का छिड़काव कर खानापूर्ति की जा रही है। राहगीर धूल के गुबार के बीच से गुजर रहे हैं।
जिन इलाकों में प्रदूषण ज्यादा, वहां नहीं होती निगरानी
एक वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्र आवासीय इलाकों में बनना था। लिहाजा, राजेंद्रनगर स्थित क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण कार्यालय में ही केंद्र बना दिया। यह शहर का पॉश इलाका है। व्यवस्थित बसा है। हरियाली है। जाम की स्थिति नहीं रहती। दूसरा केंद्र जीआईसी स्कूल के मैदान में झाड़ियों के बीच में है। वहां लोगों की आवाजाही भी नहीं होती और निर्माण कार्य की धूल सिस्टम तक कभी-कभार ही पहुंचती है।
सिविल लाइंस इलाके के निगरानी केंद्र के पास निर्माण कार्य चल रहे हैं। इसके आसपास पानी का निरंतर छिड़काव होता रहता है, फिर भी एक्यूआई 200 रहता है। इधर, पीलीभीत बाइपास, लाल फाटक, करगैना रोड, मिनी बाइपास पर धूल का गुबार रहता है। वहां निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है।
आगामी दिनों में और बढ़ेगा प्रदूषण का स्तर
बरेली काॅलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष व पर्यावरणविद डॉ. आलोक खरे के मुताबिक इस समय सुबह-शाम तापमान कम और नमी अधिक होने से धूल के कण संघनित होकर धुंध की पर्त की तरह वातावरण में छा रहे हैं। सुबह कोहरा कम पर धुंध का स्तर ज्यादा रहता है। जैसे-जैसे वातावरण में नमी बढ़ेगी, सुबह-शाम और धुंध छाएगी।
तर्क : एक किमी तक दर्ज होता है एक्यूआई
क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी रोहित सिंह के मुताबिक मानकों के अनुसार ही दोनों जगह निगरानी केंद्र स्थापित हैं। सघन बस्ती या बाजार के बीच स्टेशन बनाना मुमकिन नहीं। निगरानी केंद्र एक किमी से ज्यादा के क्षेत्र में मौजूद धूल के कणों का औसत मापने में सक्षम है। हवा की गति भी एक्यूआई को प्रभावित करती है। धीमी गति पर एक्यूआई अधिक और तेज गति पर कम दर्ज होता है।
अस्थमा, ब्रोकाइटिस व अन्य सांस रोगी परेशान
चेस्ट फिजिशियन डॉ. पुनीत गोयल के मुताबिक वायु प्रदूषण की वजह से सांस रोगियों की परेशानी बढ़ रही है। प्रदूषित हवा में सांस लेने से फेफड़ों की बीमारी से हृदय और ब्लड वेसेल संबंधी विकार का खतरा बढ़ता है। इसके अलावा त्वचा, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, एम्फीसेमा, एलर्जी, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज के मरीजों की भी तकलीफ बढ़ी है। वे परामर्श के लिए पहुंच रहे हैं।