अधिकारियों की कृपा से मिलती है सहूलियत
हर बैरक में बंदियों के बीच जेल प्रशासन के मुखबिर भी सक्रिय रहते हैं जो साथी बंदियों की हर हरकत की सूचना जेल अधिकारियों को देते हैं। वहीं जेल में सीसीटीवी कैमरे भी लगे होते हैं। ऐसे में बिना जेल अधिकारियों की मिलीभगत के बैरक और जेल परिसर में मोबाइल फोन चलाना संभव नहीं है।
जेल में बंद उन अपराधियों को ही मोबाइल फोन चलाने की सुविधा मिलती है जो अधिकारियों को मोटी रकम महीने पर देते हैं। अगर कोई वार्डर रुपये लेकर फोन अंदर पहुंचा भी दे तो उसको चार्ज करने की व्यवस्था बिना जेल प्रशासन की मिलीभगत के नहीं हो सकती। जेलों में बंद अपराधी इसी तरह फोन से अपने गुर्गों को दिशा-निर्देश दे रहे हैं।
हाई सिक्योरिटी बैरक में शिफ्ट, नहीं उगला राज
शूटर आसिफ पेशेवर अपराधी है। पुलिस से लेकर डीआईजी जेल तक ने उससे लंबी पूछताछ की, लेकिन उसने नहीं कबूला कि मोबाइल फोन किससे लेकर, कहां छुपाया? वह आखिर तक इसी बात पर अड़ा रहा कि तारीख के लिए गया था तो किसी मिलने वाले का मोबाइल हाथ में ले लिया था।
उस पर पहले से वीडियो खुला था तो उसने भी शौक में वीडियो बना ली। पुलिस ने जब आसिफ को जेल की दीवार की लोकेशन होने और आठ मार्च की शाम उसके जेल में होने की बात बताई तो वह खामोश हो गया। एहतियात के तौर पर उसे अब हाई सिक्योरिटी सेल में बंद किया गया है।
रंगदारी मांगने के लिए इस्तेमाल करते हैं फोन
कुख्यात अपराधी जेल में बैठकर फोन के जरिये ही बाहर के लोगों से रंगदारी वसूलते हैं। रंगदारी के रुपये से ही जेल अधिकारियों की भी सेवा की जाती है। वहीं दूसरी आपराधिक साजिश भी फोन के जरिये ही रची जा रही हैं।
जेल में बंद रहे अशरफ और अतीक अहमद ने असद के साथ मिलकर मोबाइल फोन के जरिये ही उमेशपाल हत्याकांड की साजिश रची थी। इस तरह के मामलों में शिकायत होने पर बड़े अफसरों की गर्दन फंसती है, इसलिए मामला दबा दिया जाता है। आरोपी के जेल में बंद होने के कारण कोर्ट से भी उसे राहत मिल जाती है।