पाकिस्तान के 40 किमी अंदर तक पहुंच गए थे भारतीय सैनिक
करगैना निवासी सेवानिवृत्त सूबेदार बीडी शर्मा वर्ष 1962, वर्ष 1965 और वर्ष 1971 के युद्ध में शामिल रहे। बताया कि 1971 के दौरान उनका कैंप पाकिस्तान से सटे बॉर्डर मुनावा पर था। वहां से दुश्मनों का सामना करते हुए पाकिस्तान सीमा के 40 किमी तक अंदर तक पहुंच गए थे। वहां पर हम कोई गतिविधि करते, तब तक सीज फायर हो चुका था। एरिया रेस्क्यू करना, सप्लाई सुचारु रखना, भूमिगत बैरक बनाना आदि जिम्मेदारियां दी गई थीं। बताया कि यह कार्य काफी कठिन था। इलाके से वाहन पार करना आसान नहीं था।
कंट्रोल रूम को देते थे पल-पल की जानकारी
डीडी पुरम निवासी पूर्व सैनिक सिकंदर सिंह ने बताया कि वर्ष 1971 में वे बतौर एयरक्राफ्ट मैन भर्ती हुए थे। बंगलूरू से उन्हें राजस्थान के जैसलमेर सेक्टर में तैनाती मिली थी। वहां आठ फीट गहराई में बंकर में ठिकाना था। वेरी हाई फ्रीक्वेंसी वायरलेस सेट से हवाई गतिविधि और मौसम का अपडेट प्रति घंटे कंट्रोल रूम को देते थे। जब तक युद्ध चला, हर दिन जान का खतरा था, पर डटे रहे। 16 दिसंबर को युद्ध थमा और सभी लौटे तो पता चला कि पाकिस्तानी सीमा पर तैनाती के दौरान चार साथी बलिदान हो गए थे।
...तो पीओके पर होता भारत का अधिकार
पूर्व सैनिक प्रथमेश कुमार गुप्ता के मुताबिक 16 दिसंबर 1971 को हमारे वीर जवानों के आगे पाकिस्तानी सेना ने घुटने टेके थे। तब संधिनामा की शर्त के तौर पर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को वापस लेने का मौका था। उस दौरान राजनीतिक वजह से मौका गंवा दिया गया। खामियाजा यह रहा कि अब तक तमाम वीर जवान पाकिस्तान के नापाक मंसूबों को नष्ट करने में बलिदान हो चुके हैं। कई बेगुनाह भी काल के गाल में समा गए।