मिर्ज़ा ग़ालिब के सफ़र के रास्ते में बरेली कभी नहीं आया, सो वह यहां कभी आए नहीं। अलबत्ता उनके ख़तों में ज़िक्र-ए-बरेली ज़रूर आया है। सन् 1865 में जब वह दूसरी बार रामपुर आए तो उन्हें बरेली आने का न्योता भी मिला। इसके जवाब में क़ाज़ी अब्दुल जमील ‘जुनून’ को लिखकर उन्होंने नहीं आ पाने की अपनी बेचारगी का इज़हार किया है।
उस बार ग़ालिब रामपुर रियासत के नए नवाब के तख्तनशीं होने के मौक़े पर आए थे। सात नवंबर के इस ख़त में उन्होंने लिखा - मसनद नशीनी की तहनियत के वास्ते रामपूर आया। मैं कहां और बरेली कहां! 16 अक्टूबर को यहां पहुंचा। बशर्ते हयात आख़िरे दिसंबर देहली को जाऊंगा। नुमाइशगाहे बरेली की सैर कहां और मैं कहां! ख़ुद इस नुमाइशगाह की सैर से जिसको दुनिया कहते हैं, दिल भर गया। अब आलमे बेरंगी का मुश्ताक हूं। और दस्तख़त किए हैं – नजात का तालिब – ग़ालिब.
‘ग़ालिब के पत्र’ में शामिल यह ख़त पढ़ने के बाद यह जानने में दिलचस्पी होना लाज़मी था कि नुमाइशगाह की सैर का न्योता देने वाले क़ाज़ी अब्दुल जमील कौन थे, और बरेली से उनका क्या रिश्ता था। उर्दू के कथाकार ख़ालिद जावेद ने बताया कि ग़ालिब ने ज्यादातर ख़त अपने शागिर्दों को ही लिखे हैं। इस्लाह लेने के लिए शागिर्द अपने अशआर उन्हें भेजते और वह उनके जवाब के साथ कुछ अपना और कुछ ज़माने का हाल भी लिखकर भेजते।
सन् 1854 से 1866 तक लिखे गए ग़ालिब के तीस ख़त पढ़ने के बाद यह अंदाज़ हो जाता है कि वह क़ाज़ी अब्दुल जमील के उस्ताद तो थे ही, दोस्त भी थे, और उनकी इज्ज़त भी बहुत करते थे। इस्लाह (सुधार) के लिए भेजे गए अशआर के जवाब में उन्होंने हिदायत देकर लिखा है – ख़त के हाशिए और पुश्त पर अशार लिखे हुए हैं। स्याही इस तरह की फीकी के हरूफ़ अच्छी तरह पढ़े नहीं जाते। अगरचे बीनाई मेरी अच्छी है, और मैं ऐनक का मोहताज नहीं मगर आप ख़ुद देख लें कि इसमें इस्लाह कहां दी जावे। आइंदा वास्ते इस्लाह के जो ग़ज़ल भेजिए, उसमें थोड़ी जगह छोड़कर लिखिए। एक और ख़त में नसीहत दी है – काग़ज़ लिफ़ाफ़े में इस तरह लपेटा कीजिए के खुलने की जगह बाक़ी रहे।
क़ाज़ी अब्दुल जमील के पुरखे मुग़लों के ज़माने में मिस्र से हिंदुस्तान आए थे। उनके ख़ानदान का सिलसिला ख़लीफ़ा हज़रत उस्मान से मिलता है। यहां आए तो बरेली की क़ाज़ियत (न्याय व्यवस्था) इस ख़ानदान के सुपुर्द हुई। सन् 1835 में पैदा हुए अब्दुल जमील ने अरबी और फ़ारसी की तालीम ली और बरेली में क़ाज़ी के ओहदे पर तैनात हुए। 1898 में उन्हें ख़ान बहादुर का ख़िताब मिला। 20 मई 1900 को उनका इंतेक़ाल हुआ।
वह मिर्ज़ा ग़ालिब के शागिर्द थे। जुनून तख़ल्लुस करते थे। हालांकि अपने लिखे कलाम वो सहेज नहीं पाए और यही वजह है कि उनका कोई दीवान नहीं मिलता। ग़ालिब से हुई ख़तो-किताबत में जो ग़ज़लें या फुटकर अशआर दर्ज हुए, बस वही बचे रह गए। ‘दस्तंबू’ (फ़ारसी में फूलों का गुच्छा) नाम से ग़ालिब की डायरी का दूसरा संस्करण उन्हीं की निगरानी में बरेली से छपा। इस किताब में 1850 से लेकर 1857 के हालात दर्ज हैं। फ़ारसी में पहली बार यह 1858 में छपी।
जुनून का लिखा ग़ालिब को मुतासिर करता और कई बार ऐसा भी हुआ कि कलाम में इस्लाह ग़ैरज़रूरी मानते हुए ज्यों के त्यों लौटा दिए। वह ख़त 7 जनवरी 1864 का है, जिसमें ग़ालिब ने लिखा – जनाब क़ाज़ी साहब को सलाम और क़सीदे की बंदगी। अगर मुझमें रचने की सकत बाक़ी होती तो क़सीदे की शान में एक क़ता और हज़रत की शान में एक क़सीदा लिखता।
ग़ालिब के आमों के शौक़ के कितने ही क़िस्से आम हैं। और वो तो न आ सके मगर बरेली के आम उन तक ज़रूर पहुंचे। क़ाज़ी अब्दुल को उनके ख़तों में दीन-दुनिया की और बातों के साथ आमों का ज़िक्र भी कई जगह आया है। 30 जून 1861 के ख़त में आमों का ज़िक्र यों आया है – जनाब क़ाज़ी साहब को बंदगी पहुंचे। हज़रत अबके साल हर जगह आम कम हैं, और जो कुछ हैं वो ख़ुश्क औ बेमज़ा हैं। आम कहां से हों? बारिश हुई नहीं, अमराइयों में तरावट नहीं है। जनाब इसका ख्याल न फ़रमावें। मैं बारिश के बाद तक जिऊंगा, आपके मोहबती आम खाऊंगा. 28 जून 1864 को लिखा – किब्ला, 120 आम पहुंचे. ख़ुदा हज़रत को सलामत रखे। दस क़लमें और छटांक भर स्याही कहार के हवाले कर दी है। ख़ुदा करे बहिफ़ाज़त आपके पास पहुंचे।
एक और जगह लिखा है – ग़ज़ल के भेजने में देर लगी। कुसूर माफ़ हो। जो मेरे अज़ीज़ बरेली आते हैं और उनसे मिलते हैं, उनका नाम आप लिखें तो कमाल मेहरबानी हो।
अपने शहर में क़ाज़ी टोला तो है मगर क़ाज़ी अब्दुल जमील को पहचानने वाले नहीं। और कहीं इंटरनेट पर उन्हें तलाश करने लग जाएं तो यूनिवर्सिटी ऑफ़ मुंबई में उर्दू के कोर्स में इंतख़ाब-ए-ख़ुतूत-ए-ग़ालिब के हवाले से क़ाज़ी अब्दुल जमील जुनून बरेलवी को लिखे गए ख़तों की पढ़ाई का जि़क्र ज़रूर मिल जाएगा। प्रभात