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न दहेज न बैंड-बाजा.. सीधे निकाह और विदाई

सार

मिसाल : दरगाह आला हजरत की हिदायत के मुताबिक बेहद सादगी से हुईं दो शादियां
 
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शादी में शामिल लोग। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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मंगनी, हल्दी, मेहंदी और मंडा जैसे तमाम रस्मो-रिवाज से भी बनाई दूरी
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दरगाह के सज्जादानशीन अहसन मियां पहुंचे दोनों जोड़ों का निकाह पढ़ाने

बरेली। किला के एक शादी हॉल में बुधवार को हुईं दो और शादियां मुस्लिम समाज के लिए मिसाल बन गईं। दोनों शादियों में न दहेज का लेन-देन हुआ, न बैंड-बाजों का कानफोड़ू शोर गूंजा। तमाम फालतू रस्मोरिवाज भी दरकिनार कर दिए गए और सीधे निकाह होने के बाद विदाई कर दी गई। आला हजरत दरगाह के सज्जादानशीन मुफ्ती अहसन रजा खां कादरी खुद इन दोनों जोड़ों का निकाह पढ़ाने पहुंचे।
दोनों शादियां जसोली गांव दो परिवारों के बीच हुईं जो आपस में रिश्तेदार भी हैं। दोनों परिवारों की बेटियां एक-दूसरे के घर में गईं। एक तरफ से शादी के बंधन में बंधने वाले शारिब कुरैशी और फरहाल कुरैशी मरहूम मोहम्मद हनीफ के बेटे और बेटी हैं तो दूसरी तरफ से आरिफ कुरैशी और उनकी बहन आफरीन कुरैशी मरहूम मोहम्मद इशहाक के बेटे और बेटी हैं। दोनों परिवार के बीच यह रिश्ता लड़के-लड़की के मामू रियाजुल हसन ने इस शर्त के साथ कराया था कि शादी में दोनों तरफ से कोई लेनदेन या फालतू रस्मोरिवाज नहीं होंगे।
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दोनों परिवारों के इस पर सहमत होने के बाद बुधवार को किला के एक शादी हॉल में निकाह किया जाना तय हुआ। दूल्हा-दुल्हन के आने के बाद सीधे निकाह की रस्म अदा हुई और फिर विदाई कर दी गई। शादी में दोनों तरफ से सिर्फ 20-20 लोगों को आमंत्रित किया गया गया। दोनों तरफ के मेहमानों के लिए एक ही दावत हुई और बेहद साधारण खर्च में पूरा कार्यक्रम संपन्न हो गया।

आला हजरत दरगाह से दी गई थी हिदायत, सादगी से की जाएं शादी

आला हजरत दरगाह के सज्जादानशीन अहसन मियां की ओर से कुछ समय पहले हिदायत दी गई थी कि मुस्लिम समाज शादियों में दहेज और फिजूलखर्ची को रोके। यह भी कहा गया था कि शादी से पहले होने वाली जैसे मंगनी, दिन-तारीख, हल्दी, मेहंदी और मंडा जैसी रस्मों को भी छोड़ा जाए जो फिजूलखर्ची की बड़ी वजह हैं। मरहूम मोहम्मद हनीफ के भाई नासिर कुरैशी ने बताया कि इन शादियों के माध्यम से यही संदेश देना था कि लोग शादी को आसान बनाएं ताकि गरीब बेटी का भी घर बस सके।
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सिर्फ निकाह ही जरूरी है जो पैगंबरे इस्लाम रसूले पाक की सुन्नत है। बाकी रस्मोरिवाज दुनिया में बनाए गए हैं और शादी के लिए गैरजरूरी होने के साथ फिजूलखर्ची को बढ़ावा देते हैं। अगर बिना दहेज, बिना रस्मोरिवाज शादियां होने लगीं तो कोई भी बेटी बिना शादी घर नहीं बैठी रहेगी। इस्लामी अमल में भी मजबूती आएगी। बैंड-बाजा और डीजे बगैरह तो वैसे भी जायज नहीं हैं। - मुफ्ती सलीम नूरी, मंजरे इस्लाम दरगाह आला हजरत
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