धर्म, संप्रदाय, जाति-बिरादरी, ऊंच-नीच और सियासी मतभेद से ऊपर उठ कर उन्होंने हर एक को अपनाया और सब के लिए दरवाजे खुले रखे। हर परेशान हाल की मदत के लिए हमेशा खड़े रहते थे। उन्हें देश-विदेश में होने वाली बड़ी-बड़ी सूफी कॉन्फ्रेंस में उन्हें आमंत्रित किया जाता था।
उनके भाई जाहिद मियां नियाजी ने बताया कि शब्बू मियां पूर्व सज्जादा हजरत शाह हसनी मियां नियाजी के खलीफा रहे और 45 साल तक खानकाह के निजाम को बखूबी संभाला। आईएमसी प्रमुख मौलाना तौकीर रजा खां ने भी दुख का इजहार किया। समाजवादी पार्टी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर दुख जताया है।
'लोगों के महबूब थे शब्बू मियां'
अंतरराष्ट्रीय शायर प्रो. वसीम बरेलवी ने कहा कि शब्बू मियां लोगों के महबूब थे। हर एक को आपस में जोड़ने का काम किया। वह शहर की गंगा-जमुनी तहजीब के पैरोकार थे। खानकाह के निजाम को बखूबी संभालने के साथ दुनिया के लोगों को भी मिलाने का काम किया। उनके चले जाने से बरेली महरूम हो गई।
तुलसी मठ के महंत नीरज नयन दास ने कहा कि शब्बू मियां अनमोल व्यक्तित्व के धनी थे। हिंदू हो या मुस्लिम, उन्होंने सभी को अपना बनाया। उनकी भाषा इंसानियत की थी। वह लोगों में भेद करना जानते ही नहीं थे। उनकी सादगी हर किसी को प्रभावित करती थी। बरेली के सौहार्द में भी योगदान रहा है।
आंवला सांसद नीरज मौर्य ने कहा कि शब्बू मियां शांति के दूत थे। उनका दुनिया से जाना एक बड़ा नुकसान है। वह बरेली की पहचान थे। उन जैसे इंसान की दुनिया में हमेशा कदर रहेगी। उनकी मिलनसार शख्सियत और इंसानियत लोगों के लिए प्रेरणा रहेगी।