रमजान का पवित्र महीना मंगलवार से शुरू हो रहा है। इसके चांद की तस्दीक के बाद यहां दरगाह आला हजरत स्थित सुन्नी मरकजी दारुल इफ्ता से एलान कर दिया गया। शहर में बादल होने के कारण रमजान मुबारक के चांद का दीदार नहीं हो सका। अलबत्ता बरेली कस्बाई इलाकों व पीलीभीत सहित आसपास के तमाम इलाकों में चांद देख लिया गया। इसमें बीसलपुर, फरीदपुर, मोहनपुर बहेड़ी सहित तमाम जगह के लोगों ने दरगाह आला हजरत स्थित सुन्नी मरकजी दारुल इफ्ता मेें रमजान मुबारक का चांद देखने की शरई शहादत दी। इसे कुबूल करते हुए शहर काजी मौलाना असजद रजा खां कादरी ने मंगलवार को माहे रमजान शुरू होने का एलान किया। प्रवक्ता मौलाना शहाबउद्दीन रजवी ने यह जानकारी प्रेस को दी है। उन्होंने बताया कि ताजुश्शरिया मुफ्ती अख्तर रजा खां (अजहरी मियां) की गैर मौजूदगी में उनके साहबजादे शहर काजी मौलाना असजद रजा खां ने रुयते हिलाल कमेटी की अध्यक्षता करते हुए तमाम आलिम की मौजूदगी में यह फैसला लिया। इस दौरान मुफ्ती अफजाल रजवी, मुफ्ती मुनाफ, नासिर कुरैशी आदि मौजूद रहे।
रमजान के रोजों की अहमियत
रमजान के रोजे इस्लाम की पांच बुनियादाें में से एक है। जो सबसे ज्यादा अहम व जरूरी अहकाम में से एक हुक्म है।
जान बूझकर रमजान के रोजे न रखने वाला सही मायने में मुसलमान नहीं है। सिर्फ एक रोजा रखकर बे वजह तोड़ देने की दुनिया में सजा कफ्फारा हैं। वह यह है कि एक गुलाम आजाद करे या फिर साठ रोजे लगातार रखे अथवा फिर साठ मिसकीनों को दोनों वक्त का खाना खिलाए और तौबा करे। कुरआन करीम में जगह-जगह और सैकड़ों हदीसों में रमजान के रोजाें का जिक्र मौजूद है। अगर कोई शख्स रमजान का सिर्फ एक रोजा जानबूझकर छोड़ दे और साल के 330 दिन रोजे रखे तो वह इसका बदला नहीं हो सकते।
रमजान में रोजे न रखना तो बहुत बड़ा गुनाह है और सख्त हराम है, लेकिन उनकी फर्जियत का इन्कार करना यानि यह कहना कि यह कोई जरूरी काम नहीं है, कुफ्र है। ऐसे ही रोजों की या रोजेदारों की रोजे की वजह से हंसी उड़ाने व मजाक बनाने वाला भी मुसलमान नहीं रहता। जैसे कुछ लोग कह देते हैं कि रोजा वह रखे जिसके घर खाने को न हो तो ऐसा कहने वाला इस्लाम से खारिज हो जाता है। ऐसे ही यह मिसाल देना कि नमाज पढ़ने गए थे रोजे गले पड़ गए यह भी कुर्फ हैं।