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कोविड की मार और महंगी मिट्टी, इसलिए बन रहे पीओपी के गणपति

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गणेश जी मूर्ति में रंग भरते कलाकार। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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शहर के कारीगर इस बार मिट्टी की जगह बना रहे हैं प्लास्टर ऑफ पेरिस के गणेश

बरेली। इस बार शहर में कहीं भी इको फ्रें डली गणपति नहीं बनाए जा रहे हैं। शहर में तीन से चार जगह इनका बड़े स्तर पर काम होता था, लेकिन इस बार किसी भी कारीगर ने मिट्टी के गणपति नहीं बनाए हैं। सभी ने पीओपी के ही गणपति तैयार किए हैं। इसका बड़ा कारण मिट्टी का महंगा होना और बाजार में पीओपी की प्रतिमाओं की मांग बढ़ना है।
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शहर के पीलीभीत बाईपास पर सतीपुर चौराहे के पहले, महानगर के पास, कुदेशिया ओवरब्रिज के नीचे और कलाम मार्ग पर कारीगर मूर्तियां तैयार करते हैं। ये लोग खुद ही इनकी बिक्री करते हैं। शहर के मूर्ति दुकानदार भी इन्हीं से मूर्तियां खरीदते हैं। हर साल ये लोग बड़ी तादात में मिट्टी की मूर्तियां तैयार करते हैं, लेकिन इस बार किसी भी कारीगर ने एक भी मूर्ति मिट्टी की तैयार नहीं की है। सभी ने पीओपी के ही गणपति तैयार किए हैं।
अब्दुल कलाम मार्ग पर मूर्तियों को अंतिम रूप देने में जुटीं रूपा बताती हैं कि मिट्टी महंगी है। आसानी से मिल भी नहीं रही है। दो साल से कोविड के कारण काम भी मंदा है। मिट्टी की मूर्ति तैयार करने में लागत अधिक आती है। तीन फुट की मिट्टी की मूर्ति तैयार करने में करीब चार हजार रुपये लग जाते हैं, जबकि पीओपी की मूर्ति इतने रुपये में करीब छह फुट की तैयार हो जाती है। समय भी कम लगता है। बनाने के दौरान टूटने की आशंका भी कम रहती है। अभी कोरोना से उबर रहे हैं, ऐसे में सिर्फ पीओपी की मूर्तियां ही तैयार की हैं।
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कुदेशिया फाटक के नीचे मूर्तियां तैयार कर रहे लक्ष्मण बताते हैं कि इस बार मिट्टी की मूर्ति नहीं बनाईं हैं। इसका मुख्य कारण मिट्टी की महंगाई और सहज सुलभ न होना है। कारीगर लक्ष्मण ने बताया कि उन्हाेंने इस बार पर्यावरण के लिहाज से पीओपी के साथ भी कुछ प्रयोग किए हैं। यह मूर्तियां भी विसर्जन के बाद पानी में घुल जाएंगी। उन्हाेंने सिर्फ पीओपी से इसे तैयार नहीं किया है। पीओपी के साथ मिट्टी और नारियल जटा का इस्तेमाल किया है। इससे बनीं मूर्तियां विसर्जन से एक घंटे के अंदर करीब पचास फीसदी घुल जाएंगी। उसके बाद नारियल जटा अलग हो जाएंगी। करीब पचास फीसदी पीओपी पानी में बनी रहेगी।
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