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अकीदत और इत्तेहाद के माहौल में अदा की गई जश्न-ए-चिरागां की रस्म

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खानकाह ए नियाजिया में जश्ने चिरागा में बड़ी संख्या में पहुंचे अकीदतमंद ने चिराग किया।
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हर मजहब-ओ-मिल्लत के लोगों ने रोशन किए चिराग
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बरेली। खानकाह नियाजिया की तीन सदी पुरानी रस्म है जश्न-ए-चिरागां। यह रस्म एक खुसूसी इबादत को भी अंजाम देती है और मुल्क की तहजीब को भी मजबूत करती है। इंसानी बिरादरी को जोेड़ने का पाकीजा मकसद रखती है। यही वजह है कि इस रूहानी तकरीब में हर मजहब मिल्लत के लोग शामिल रहते हैं।
जश्न-ए-चिरागां की तकरीब का आगाज मंगलवार सुबह फज्र की नमाज के बाद कुरआन ख्वानी की पाकीजा रस्म के साथ हुआ। इसके बाद अकीदतमंद दिन भर मन्नत-ओ-मुरादों, चादरपोशी, गुलपोशी और नज्र-ओ-नियाज में मसरूफ रहे। शाम को महबूब-ए-इलाही और महबूब सुभानी के कुल शरीफ की रस्म अदा की गई। इसके बाद सज्जादानशीन अलहाज शाह मेहंदी मियां ने सोने और चांदी के खानकाही चिराग रोशन किए। इसके बाद लोग कतार दर कतार चिराग हासिल करने के लिए एकत्र हुए। इसी के साथ मन्नतों के चिराग रोशन करने का सिलसिला शुरू हुआ। रात में खानकाही कव्वाल ने कुल शरीफ के खुसूसी कलाम पेश किए।
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अंत में सज्जादानशीन मेहंदी मियां साहब ने मुल्क और हाजरीन के लिए खुसूसी दुआ की। इसके बाद साहिबे सज्जादा निजामुद्दीन औलिया के उर्स में शिरकत करने के लिए दिल्ली रवाना हो गए। जश्न-ए-चिरागां में सज्जादानशीन हजरत मेहंदी मियां के अलावा सभी साहबजादगान, अकीदतमंदों की मन्नतों के लिए खुसूसी दुआएं की। खानकाह प्रबंधक शाह सिबतैन हसन नियाजी उर्फ शब्बू मियां ने बताया कि 17 रबीउस्सानी को जश्न-ए-चिरागां की रिवायत है। मान्यता है कि जश्न-ए-चिरागां में लोग चिराग जलाकर जो मन्नत मांगते हैं, वह पूरी हो जाती है।

खानकाह ए नियाजिया में जश्ने चिरागा में बड़ी संख्या में पहुंचे अकीदतमंद ने चिराग किया।

 

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