बरेली। कभी जरूरत के लिए इस्तेमाल होने वाला स्मार्टफोन अब मानसिक बीमारियों की वजह बन रहा है। लंबे समय तक फोन पर सर्फिंग से बच्चे और युवा स्क्रीन एडिक्शन की समस्या से पीड़ित हैं। जिससे वे सामाजिक, मानसिक और शारीरिक तौर पर ‘बीमार’ बन रहे हैं। जिला अस्पताल की सायकोलॉजिस्ट के मुताबिक अब तक आए करीब दो दर्जन मामलों में सभी स्क्रीन एडिक्शन की गिरफ्त में हैं। स्मार्टफोन से निकलने वाली किरणें ‘ड्रग्स’ की तरह असर करती हैं। जिसकी चपेट में आने पर उससे निकलना मुश्किल होता है।
जिला अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. खुश अदा के मुताबिक इस नशे की गिरफ्त में बच्चों को ले जाने वाले उनके माता पिता हैं। क्योंकि वे बच्चों को मोबाइल थमाकर खाना खिला रहे हैं ताकि वे रोएं नहीं और बच्चों को घर में बांधे रखने के लिए मोबाइल दे रहे हैं। जिससे बच्चों में विडियो देखने या गेम्स खेलने की लत लग गई है। बताया कि खाना खाते हुए फोन देखने और गेम्स खेलने की लत की से अटेंशन डेफिसिट डिसॉर्डर, हाइपरऐक्टिविटी और स्लीप डिसॉर्डर जैसी बीमारियां बच्चों को घेर रही हैं। डॉ. आशीष के मुताबिक स्क्रीन एडिक्शन से बच्चों में भूख लगने की प्रवृत्ति कम होती जा रही है। भूख और संतुष्टि को समझने की क्षमता खत्म हो रही है। साथ ही, यह लत हार्मोन को भी प्रभावित कर रही है। क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकलने वाली ब्लू लाइट नेचुरल स्लीप हॉर्मोन मेलाटोनिन पर दबाव डालती है। इंसान के विकास के ज्यादातर हॉर्मोन्स रात को एक्टिव रहते हैं। लेकिन जब बच्चे कम सोएंगे तो उसका पूरी तरह विकास नहीं हो पाएगा।
विकसित नहीं होती इंद्रियां
सायकोलॉजिस्ट के मुताबिक मोबाइल की लत से इंद्रियों का विकास बाधित होता है। इसका शॉर्ट टर्म इफेक्ट में सोने के वक्त में कमी, चिड़चिड़ापन और लॉन्ग टर्म में व्यवहार संबंधी समस्या, एकाग्रता में समस्या, स्कूल परफॉर्मेंस पर असर, अटेंशन डेफिसिट के रूप में सामने आती है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. कर्मेंद्र ने बताया कि बाहर खेलने के दौरान बच्चों के न्यूरल नेटवर्क का सामना चुनौतियों से होता है जो दिमाग व शरीर को हेल्दी बनाने में मदद करते हैं।
बच्चे देर से सीखते हैं बोलना
मोबाइल के अत्यधिक प्रयोग से बच्चों में बोलने की प्रक्रिया देर से शुरू होती है। बड़े होने के बाद बातचीत से जुड़ी परेशानियों सामने आएंगी। बताया कि पांच साल से छोटे बच्चों को एक घंटे, पांच से दस साल तक के बच्चो को ढाई घंटे ही मोबाइल देना चाहिए। एकाग्रता और शारीरिक विकास बाधित होने से बच्चों में हाइपरऐक्टिव बिहेवियर, डिप्रेशन और सुसाइड की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। जो घातक होती है।
कैसे करें बच्चों को मोबाइल से दूर
- मोबाइल, टीवी देखने का समय तय करें और सख्ती से लागू करें।
- खाते हुए, सोने से पहले बच्चों को मोबाइल न दें। बातचीत करें।
- बच्चों के लिए जो नियम तय करें, उन्हें खुद भी फॉलो करें।
- बच्चों को स्टोरी टेलिंग, बोर्ड गेम्स, आउटडोर एक्टिविटी जैसे काम में व्यस्त करें।
- बच्चों को मनाने, खिलाने, लालच देने के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करें।
केस- 1
इंदिरा नगर निवासी महेश अग्रवाल का 3 वर्षीय बेटा चमन साफ नहीं बोल पाता। कई माह चाइल्ड स्पेशियलिस्ट को दिखाया पर फायदा नहीं हुआ। इसकी चर्चा उन्होंने अपने मित्र से की तो उन्होंने मनोचिकित्सक को दिखाने का सुझाव दिया। वे मनकक्ष पहुंचे और यहां दिखाया तो स्क्रीन एडिक्शन का पता चला। करीब डेढ़ माह तक चली काउंसलिंग व दवाओं के बाद अब चमन साफ शब्दों में बात कर पाने में समर्थ हो सका है।
केस- 2
सुभाषनगर राजीव कॉलोनी निवासी 16 वर्षीय अंशुमान इस बार 10वीं में है। कक्षा 7वीं तक टॉप टेन में रहने वाला अंशुमान को 8वीं, 9वीं मेें बेहद कम मार्क्स रहे। उसमें क्रोध, चिड़चिड़ापन और सुसाइड की इच्छा होने लगी। जिसकी जानकारी फ्रेंड्स को हुई तो वे उसे जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। जहां काउंसलिंग में स्क्रीन एडिक्शन का पता चला और उसकी काउंसलिंग की जा रही है। करीब 13 दिन हुए उसकी स्थिति में सुधार हो रहा है।