बदायूं। एक शहंशाह ने अपनी बेगम की याद में मकबरा बनवाया। दुनिया जिसे ताजमहल के नाम से जानती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि एक बेगम ने भी अपने शौहर की याद में ताजमहल जैसा मकबरा बनवाया। नवाब इखलास खां का रोजा, ऐसी ही मोहब्बत की निशानी है।
शहर के मोहल्ला जवाहरपुरी में लाल ककइया ईंटों से बना नवाब इखलास खां का मकबरा (रोजा) यहां पहली बार आने वाले लोगों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं है। इसकी बनावट हूबहू ताजमहल जैसी है। बदायूं के गजेटियर में इस इमारत का जिक्र है। साथ ही शहर के मरहूम सिबतैन अहमद की लिखी किताब बदायूं कदीमो जदीद (बदायूं- प्राचीन और वर्तमान) में इस खूबसूरत इमारत का जिक्र और इतिहास दिया गया है। स्थानीय इतिहास के जानकारों के मुताबिक जिस तरह शाहजहां ने बेगम मुमताज महल की याद में आगरा में ताजमहल बनवाया, उसी तरह अपने शौहर नवाब इखलास खां की याद में महबूब बेगम ने इस मकबरे का निर्माण कराया था। ऐसा कहा जाता है कि सैकड़ों कामगार लगाने के बाद कीब ढाई साल में इमारत तामीर हो सकी थी। लेकिन इस मकबरे को ताजमहल जैसी शोहरत नहीं मिल सकी। इखलास खां मुगल बादशाह शाहजहां के समकालीन थे। शाहजहां के कई विजय अभियान में इखलास खां उनके साथ थे।
चिश्तियों के खानदानी रंगमहल में हुआ था जन्म
- इस्लामिया इंटर कॉलेज से रिटायर इतिहास प्रवक्ता मोहम्मद इशराक के मुताबिक नवाब इखलास खां उर्फ अल्लादीया के पिता का नाम शेख इब्राहिम किश्वर खां था। इन्हीं के नाम पर मोहल्ला इब्राहिम बसाया गया जो बाद में ब्राह्मपुर के रूप में स्थापित हो गया। इखलास खां का जन्म शहर के मोहल्ला सोथा में चिश्तियों के खानदानी रंगमहल में हुआ था।
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पांच कब्र हैं मकबरे में
मकबरे में नवाब इखलास खां व उनके परिवार के चार अन्य लोगों की कब्र हैं। ताजमहल की तरह असली कब्र मकबरे के नीचे है। ऊपरी हिस्से में हॉल के अंदर हूबहू वैसी कब्रें बनी हैं। मकबरे के चारों कोनों पर ताजमहल की तरह ही ऊंची मीनारें हैं। इनमें ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ियां बनी हैं। मकबरे के आसपास पहले बाग और तालाब था। अब जवाहरपुरी मोहल्ला बसा हुआ है।
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यहीं कैद किए आजादी के दीवाने
1857 की क्रांति में बदायूं में भी विद्रोह हुआ था। स्थानीय क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजा दिया था। अंग्रेजी हुकूमत ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को इसी मकबरे में अस्थायी जेल बनाकर कैद कर दिया था।
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देखभाल करने वाला कोई नहीं
यूं तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस इमारत को संरक्षित घोषित कर रखा है। पूर्व के वर्षों में यहां इमारत की देखभाल करने के लिए एक चौकीदार नियुक्त किया गया था पर अब काफी समय से यहां कोई कर्मचारी नहीं है। पड़ोस में रहने वाले बबलू ने बताया कि आसपास के लोग ही यहां कभीकभार झाड़ू लगा जाते हैं। कुछ अकीदतमंद यहां आकर कब्रों पर पड़ी चादरों को बदल जाते हैं। मकबरे में चारों ओर बनी गैलरी का फर्श उखड़ने लगा है।
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पुस्तक रुहेलखंड संस्कृति एवं इतिहास के लेखर प्रो. गिरिराज नंदन का कहना है कि मुगलों की बनाईं कई इमारतें आज भी यहां हैं, जिनमें से कई देखभाल न होने के कारण खुर्दबुर्द होने के कगार पर हैं।