बरेली। खेलों में कुछ खिलाड़ी एक अच्छा मुकाम हासिल करने के बाद कई बार खुद तक सीमित रह जाते हैं। वहीं कुछ अपनी उपलब्धियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प लेते हैं। शहर में आयोजित हो रही तैराकी प्रतियोगिता में चयनकर्ता के रूप में आए पूर्व खिलाड़ियों में कई की कहानी कुछ ऐसी ही है। ये लोग उभरते हुए खिलाड़ियों को निखार रहे हैं। इनके कई शिष्य राष्ट्रीय स्तर पर नाम भी रोशन कर चुके हैं।
बड़े भाई से प्रेरित होकर तैराकी में बनाया भविष्य
प्रयागराज की नदियों में तैराकी की शुरुआत करने वाले उमेश प्रसाद निशाद ने साल 1981 में अपने बड़े भाई राकेश से प्रेरणा लेकर तैराकी के क्षेत्र में कदम रखा। उमेश ने अपनी लगन और मेहनत से तैराकी में निपुणता हासिल की और खेल छात्रावास के ट्रायल में सफलता पाई। उन्होंने स्टेट चैंपियनशिप, साउथ एशियन चैंपियनशिप, एशिया पैसिफिक चैंपियनशिप में पदक हासिल कर देश का नाम रोशन किया। उन्हें वर्ष 2000 में लक्ष्मण पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है। वर्तमान में उमेश भारतीय रेलवे टीम के कोच के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इससे पूर्व वह बरेली में भी तैराकी के कैंप आयोजित कर चुके हैं।
तैराकी प्रतियोगिता ने बदली दिशा
वाराणसी की शीला भट्टाचार्या ने तैराकी में अपना भविष्य बनाकर कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पदक जीते। परिवार का खेलों से पुराना जुड़ाव था। बचपन में उनका रुझान भी शूटिंग की ओर था, लेकिन स्कूल में आयोजित तैराकी प्रतियोगिता ने उनकी राह बदल दी। इसके बाद उन्होंने पूरी लगन से तैराकी का प्रशिक्षण लिया और खेल में नई ऊंचाइयों को छुआ। उन्होंने बीपीएड, एमपीएड और एनआईएस का कोर्स भी किया। अब वह आंबेडकर नगर में स्पोर्ट्स ऑफिसर के पद पर नियुक्त हैं।
मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर हासिल किया मुकाम
झांसी के राकेश कुमार यादव का तैराकी से परिचय बचपन में हुआ। शुरुआत में वे सिर्फ मस्ती के लिए पानी में उतरते थे, लेकिन समय के साथ उनका रुझान तैराकी की ओर बढ़ता गया। उन्होंने इस खेल में भविष्य बनाने का निर्णय लिया और मजबूत इच्छाशक्ति के साथ अभ्यास शुरू किया। कठिन परिश्रम के बल पर उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में पदक हासिल किए। इस दौरान उनकी नियुक्ति वर्ष 2007 से 2013 तक शहर के स्पोर्ट्स स्टेडियम में संचालित तैराकी छात्रावास के लिए भी हुई थी। इस समय वह मथुरा में स्पोर्ट्स ऑफिसर के पद पर नियुक्त हैं। संवाद