लागत घटाकर आय बढ़ाने को दी प्राथमिकता
सोमपाल ने बताया कि ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए वह लागत में कमी ला रहे हैं। सिंचाई पर होने वाला खर्च बचाने के लिए ड्रिप इरिगेशन की व्यवस्था की है। इससे पानी की भी बचत होती है। महंगे उर्वरकों की जगह वह देसी खाद का प्रयोग करते हैं।
खुद ही करते हैं मार्केटिंग
सोमपाल अपने खेत में उगाई जाने वाली फसलों की मार्केटिंग भी खुद ही करते हैं। खेती का तरीका पूरी तरह से जैविक है, इसलिए फसल की कीमत भी अच्छी मिलती है। कई लोग खेत से ही सब्जियां खरीद लेते हैं।
धान की तुलना में चार गुना मुनाफा
जिला उद्यान अधिकारी पुनीत पाठक ने बताया कि शतावर की खेती में धान की तुलना में चार गुना अधिक मुनाफा मिलता है। बरेली में धान का औसत उत्पादन 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। समर्थन मूल्य पर भी इसकी ब्रिकी करते हैं तो हाथ में एक लाख रुपये आते हैं। वहीं, एक हेक्टेयर में 12 से 14 क्विंटल शतावर की उपज मिलती है। इस समय एक क्विंटल शतावर का दाम करीब 32 हजार रुपये है।
इस हिसाब से एक हेक्टेयर में करीब चार लाख रुपये की फसल मिलती है। धान की तुलना में इसकी लागत भी कम है। एक हेक्टेयर में शतावर लगाने पर 2.50 से तीन लाख रुपये की लागत आती है। सहफसली लगाने पर पूरी लागत दूसरी फसल से ही निकल आती है। धान के साथ सहफसली नहीं की जा सकती है। मार्च से जुलाई के बीच शतावर की पौध लगाई जा सकती है।
विभोर अग्रवाल की नर्सरी ।
- फोटो : संवाद
विभोर ने हरियाली में तलाश ली खुशहाली की राह
सिविल लाइंस में स्थित डाक्टर्स कॉलोनी निवासी कृषि स्नातक विभोर अग्रवाल ने निजी कंपनी की नौकरी छोड़कर अपनी पढ़ाई और नौकरी के अनुभव को ही कमाई का जरिया बना लिया। दो वर्ष में ही सफलता उनके कदम चूम रही है।
भुता क्षेत्र के फैजनगर गांव में दो एकड़ खेत किराये पर लेकर सब्जी के पौधों की नर्सरी विकसित की। शहर से 500 किमी दूर पूर्वांचल तक के किसान उनसे पौधे खरीदते हैं। एक वर्ष में वह 10 लाख पौधे बेच लेते हैं। लागत निकालकर 10 लाख रुपये प्रतिवर्ष की आय होती है।
वैभव ने 2020 में दून (पीजी) कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर साइंस एंड टेक्नोलॉजी देहरादून से बीएससी एग्रीकल्चर पूरा किया। वर्ष 2021 में फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर साइंसेज से ग्रीनहाउस और मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी से रूट जोन मैनेजमेंट पर ऑनलाइन सर्टिफिकेट कोर्स किया। छत्तीसगढ़ में एक सीड कंपनी में एक साल नौकरी की। अब उससे पांच गुना अधिक कमाई कर रहे हैं।
विभोर अग्रवाल ने बताया कि नौकरी छोड़ी तो किराये पर खेत लेकर कदम आगे बढ़ाया। किसान जो पौध तैयार करते हैं वह बीमारी का शिकार हो जाती है। इसलिए मैंने रोगमुक्त पौध तैयार की। किसान ऐसी ही पौध की तलाश में थे। यही वजह रही कि मुझे ऑर्डर मिलने लगे। नर्सरी का प्रयोग सफल रहा।
खेती व बागवानी की जुगलबंदी से तरक्की की राह पर बलवीर
बढ़ेपुरा निवासी किसान बलवीर सहाय गंगवार खेती और बागवानी की जुगलबंदी से मालामाल हो रहे हैं। उन्होंने अपने खेत में पिंक ताइवान अमरूद, किन्नू, अनार, शहतूत, आम, अंजीर, व नीबू के पौधे लगा रखे हैं। उनके खेत में एक साल में तीन बार आम आता है। आम की यह प्रजाति ऑल टाइम मैंगो के नाम से प्रसिद्ध है। आम व अमरूद से कमाई शुरू हुई तो बागवानी के प्रति रुझान और बढ़ गया। वह वर्ष 2011 में पीलीभीत में प्रभारी जिला सूचना अधिकारी रहे।
प्रगतिशील किसान बलवीर सहाय गंगवार ने बताया कि पिंक ताइवान अमरूद मैने 35-40 रुपये प्रति किलोग्राम मंडी में बेचा। सामान्य खेती के मुकाबले बागवानी में दोगुना फायदा है। अगर हम सही बीज का चयन करके देखरेख करते हैं तो खेत की मिट्टी सोना उगलने के लिए तैयार है।